(अजय मसंद)
नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर रिकर्व तीरंदाजी में दक्षिण कोरिया का दबदबा लंबे समय से कायम रहा है और उसे चुनौती देना लगभग नामुमकिन माना जाता था लेकिन आइची-नागोया एशियाई खेलों में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने वाली कुमकुम मोहोद का मानना है कि अब यह तस्वीर बदल चुकी है। उनका कहना है कि एशियाड में उनके ऐतिहासिक स्वर्ण पदक ने भारतीय तीरंदाजों में नया विश्वास जगाया है और उन्हें उम्मीद है कि भारत आने वाले टूर्नामेंट में कोरियाई तीरंदाजों को और कड़ी टक्कर दे सकेगा। महाराष्ट्र के अमरावती की 17 वर्षीय कुमकुम ने एशियाड में व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनकर इतिहास रच दिया।
उन्होंने महिला टीम स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक जीता जबकि धीरज बोम्मादेवरा के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक अपने नाम किया। व्यक्तिगत स्पर्धा में उनकी जीत से भारत ने लॉस एंजिलिस 2028 ओलंपिक के लिए एक महत्वपूर्ण कोटा स्थान भी हासिल किया। कुमकुम के करियर का सबसे यादगार पल दक्षिण कोरिया की ओ येजिन के खिलाफ व्यक्तिगत फाइनल में आया।
ओ येजिन 2023 विश्व तीरंदाजी युवा चैंपियनशिप के अंडर-21 वर्ग में दो स्वर्ण पदक जीत चुकी थीं। कड़े मुकाबले में भारतीय तीरंदाज ने दबाव के बावजूद धैर्य बनाए रखा और निर्णायक निशाना लगाकर जीत हासिल की। भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) की ओर से आयोजित बातचीत में कुमकुम ने कहा, ‘‘एक दिन कोरिया का दबदबा टूटना ही था।
सभी को लगता था कि उन्हें हराना नामुमकिन है, लेकिन यह पदक बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे पहले रिकर्व में कोई व्यक्तिगत पदक नहीं मिला था। मुझे लगता है कि भविष्य की प्रतियोगिताओं में हमारा प्रदर्शन और बेहतर होगा क्योंकि अब सभी खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। ’’
फाइनल मुकाबला 5-5 की बराबरी के बाद शूट-ऑफ में पहुंच गया।
कुमकुम ने दबाव के बावजूद परफेक्ट 10 का निशाना लगाकर स्वर्ण पदक पक्का कर लिया जबकि ओ येजिन केवल आठ अंक ही हासिल कर सकीं। कुमकुम ने कहा, ‘‘उस समय मेरी धड़कनें बहुत तेज हो रही थीं, लेकिन मैंने खुद को शांत किया, सहज हुई और खुद से कहा कि मुझे सिर्फ सही तरीके से तीर छोड़ना है और किसी चीज के बारे में नहीं सोचना है। मुझे पता था कि यही वह एक तीर था, जो मुझे स्वर्ण पदक दिला सकता था।
मेरे सयंम का मुझे पूरा फायदा मिला। ’’
दबाव के बीच उनका संयम वर्षों की मानसिक तैयारी का नतीजा था। कुमकुम ने अपने प्रदर्शन के हर पहलू की कल्पना करने का अभ्यास किया है जिसमें निशाना साधने की मुद्रा से लेकर तीर छोड़ने, उसके लक्ष्य पर लगने और अंत में पदक जीतने तक का अभ्यास शामिल रहा।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपनी मुद्रा से लेकर तीर छोड़ने और उसके लक्ष्य पर लगने तक हर चीज की कल्पना करती हूं। मैं खुद को स्वर्ण पदक जीतते हुए भी देखती हूं। ’’
कुमकुम ने कहा, ‘‘मैं कई वर्षों से अलग-अलग परिस्थितियों की मानसिक कल्पना करके खुद को तैयार कर रही हूं और मुझे खुद पर भरोसा था।
शुरुआत में मेरी धड़कनें बहुत तेज हो रही थीं, लेकिन मैंने सांस लेने का अभ्यास किया, खुद को शांत किया और अपना हौसला बढ़ाया। मैंने खुद से कहा कि मैं यह कर सकती हूं, मुझे सिर्फ तीर चलाना है, किसी और चीज पर ध्यान नहीं देना है और अपनी प्रक्रिया का पालन करना है। ’’
यह स्वर्ण पदक उनके परिवार के त्याग और संघर्ष से भरे सफर की भी कहानी है।
उनका पहला धनुष (जिसकी कीमत महज 3,000 रुपये थी) उनकी दादी ने उन्हें उपहार में दिया था। उस समय उनके पिता ऐसे खेल में निवेश करने को लेकर हिचकिचा रहे थे, जिसमें काफी पैसा खर्च होता है। कुमकुम ने बताया, ‘‘मेरे पिता कहते थे कि मुझे पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।
वह खेल को लेकर ज्यादा समर्थन नहीं कर रहे थे क्योंकि यह महंगा खेल है। इसलिए मेरी दादी ने मुझे वह धनुष उपहार में दिया। शुरुआत में बहुत मुश्किलें आईं, लेकिन बाद में मेरे पिता ने भी मेरी मदद की।
यह सफर बहुत कठिन रहा है।
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