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- Historic 135 Year Old Library Demolition Controversy | Lord Curzon Legacy
2 मिनट पहले
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सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी देश की सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी सरकारी लाइब्रेरी है। 1969 में शास्त्री भवन में स्थापित की गई ये लाइब्रेरी अब तक 5500 स्क्वायर मीटर में 4 मंजिल में संचालित की जा रही है।
मगर अब इसे सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तोड़ा जाना है और किताबों को शिफ्ट करने के लिए अभी तक दूसरी जगह नहीं मिली है।
लाइब्रेरी में 1702 की दुर्लभ किताबें, सरकारी रिकॉर्ड और गजेटियर भी शामिल हैं। इस लाइब्रेरी में हर दिन सरकारी अधिकारी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, 3 हफ्ते में जवाब मांगा
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने लाइब्रेरी शिफ्ट करने की जगह को लेकर केंद्र सरकार से तीन हफ्ते में जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि नए सेंट्रल विस्टा प्लान में लाइब्रेरी के लिए कितनी जगह दी गई है?
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने सोमवार को केंद्र से जगह का लेआउट प्लान और पूरा ब्योरा हलफनामे में देने को कहा है।
कोर्ट ने पूछा कि 1891 से चल रही लाइब्रेरी और 8.5 लाख किताबों के साथ आरके पुरम में रखी 2 लाख किताबें के लिए क्या सिर्फ दो कमरे दिए जा रहे हैं? आरके पुरम में रखी किताबों का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सीनियर एडवोकेट हरिप्रिया पद्मनाभन को अमिकस क्यूरी नियुक्त किया है।
2023 में संस्कृति मंत्रालय ने नई जगह की मांग की थी
सेंट्रल विस्टा नई दिल्ली में रायसीना हिल से लेकर इंडिया गेट तक के इलाके का एक बड़ा पुनर्विकास प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट के तहत, शास्त्री भवन जिसमें 4 मंजिला सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी है, उसे तोड़कर उस जगह कर्तव्य भवन 4 और 5 बनाए जाने हैं।
इस प्रोजेक्ट की घोषणा 2019 में की गई थी और सरकार को पहले से ही पता था कि प्रशासनिक केंद्र में किन संस्थाओं को जगह दी जाएगी। अब सवाल ये है कि इतनी पुरानी लाइब्रेरी कैसे कहीं और शिफ्ट होगी?
कैसे बनी देश की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी
इसे 1901 के इंपीरियल लाइब्रेरी एक्ट के तहत मान्यता मिली थी। इस एक्ट में कहा गया था कि ‘इसका मकसद एक रेफरेंस लाइब्रेरी बनाना है, जो स्टूडेंट्स के लिए पढ़ने की जगह हो और भारत के भविष्य के इतिहासकारों के लिए भंडार हो। इसमें भारत के बारे में किसी भी समय लिखी गई हर किताब को देखा और पढ़ा जा सके’।

ब्रिटिश भारत के पहले इतिहासकार ने शुरुआत की
एफ. डब्ल्यू . फॉरेस्टरवे ब्रिटिश भारत के पहले इतिहासकार, शिक्षक और अभिलेखपाल थे। उन्हें कोलकाता इंपीरियल डिपार्टमेंट का पहला क्यूरेटर अपॉइन्ट किया गया था।
फॉरेस्टर ने ‘प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867’ के तहत मिले लगभग एक हजार वॉल्यूम (किताबों के सेट) को इकट्ठा किया, जो कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में पड़े हुए थे। इस कलेक्शन और उसी बिल्डिंग में मौजूद दूसरे सचिवालय पुस्तकालयों के अलग-अलग कलेक्शन को मिलाकर ‘इंपीरियल लाइब्रेरी’ नाम दिया गया, जिसका उद्घाटन 11 मई 1891 को हुआ था।
ईस्ट इंडिया कॉलेज, फोर्ट विलियम कॉलेज की किताबें शामिल
इस लाइब्रेरी कलेक्शन में ईस्ट इंडिया कॉलेज, फोर्ट विलियम कॉलेज और लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी बोर्ड के लाइब्रेरी की किताबें कलेक्शन का हिस्सा रही हैं।
हालांकि जब इंपीरियल लाइब्रेरी एक्ट के तहत एक नई इंपीरियल लाइब्रेरी बनाई गई, तो पुराने इंपीरियल रिकॉर्ड्स ऑफिस का पूरा कलेक्शन नई लाइब्रेरी में नहीं भेजा गया, बल्कि कलेक्शन का एक हिस्सा ‘इंपीरियल सचिवालय पुस्तकालय’ के पास ही रखा गया था। जिससे ये इंपीरियल लाइब्रेरी से अलग पहचाना जा सके और ये राइटर्स बिल्डिंग में ही काम करता रहा।

1912 में राजधानी बदली और लाइब्रेरी का पता भी
1912 में राजधानी के दिल्ली शिफ्ट होने के साथ ही ‘इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी’ को भी दिल्ली लाया गया और इसे सिविल लाइन्स, दिल्ली की पुरानी सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग में रखा गया। 1913 में इसके कलेक्शन का कुछ हिस्सा शिमला सेक्रेटेरिएट भेज दिया गया।
10 फरवरी 1931 को नई दिल्ली में नए सेक्रेटेरिएट के उद्घाटन के साथ, इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को नॉर्थ ब्लॉक में शिफ्ट कर दिया गया और शिमला में चल रही सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को भी इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी में मिला दिया गया।
300 स्क्वायर मीटर के दो कमरों का ऑफर, नामंजूर
सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तोड़ा जा रहा है। सीपीडब्ल्यूडी ने सभी मंत्रालयों को 30 सितंबर तक भवन खाली करने को समय दिया था। हालांकि, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय और सीपीडब्ल्यूडी अब तक इस लाइब्रेरी के लिए नई जगह नहीं ढूंढ पाए हैं। लाइब्रेरी के लिए कर्तव्य भवन-2 में 300 स्क्वायर मीटर की दो कमरों की जगह ऑफर की गई थी, जिसे लाइब्रेरी प्रशासन ने इनकार कर दिया।
ये लाइब्रेरी CSL भारतीय राज्य के लिए एक वर्किंग आर्काइव (कामकाजी संग्रह) के तौर पर काम करती है, जो इसकी संस्थागत यादों और पिछली सरकारों के कामों और फैसलों का रिकॉर्ड रखता है। यह सरकार के अपने रिकॉर्ड रूम जैसा है। इतनी बड़ी आर्काइव को बगैर किसी सुरक्षा के यूंही छोड़ना चिंताजनक बात है।
किताबों को सुरक्षित रखना बड़ा संघर्ष
रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल आर्काइव्स एनेक्सी को गिराने और नेशनल म्यूजियम के कलेक्शन को दूसरी जगह ले जाने पर लोगों के बीच बातचीत हुई और विशेषज्ञों की राय ली गई। इससे पता चलता है कि नेशनल म्यूजियम का कलेक्शन ‘युगे युगीन भारत म्यूजियम’ में ले जाया जा रहा है, जो नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की इमारतों में बन रहा है।
लेकिन इसकी सही इन्वेंट्री और कैटलॉगिंग, संरक्षण की सुविधाएं, नाजुक और दुर्लभ चीजों के लिए क्लाइमेट-कंट्रोल्ड स्टोरेज, डिजिटाइजेशन, ट्रेंड स्टाफ और लोगों की पहुंच की जरूरत होगी।
अस्थाई बदलाव स्थायी क्यों हो सकता है?
CSL की क्षेत्रीय भाषाओं का सेक्शन, ‘तुलसी सदन लाइब्रेरी’ मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए 2011 में अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया था। इसके सामान को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के परिसर में रख दिया गया और ये लाइब्रेरी आज भी बंद है।
बिना किसी फाइनल जगह के लाखों दुर्लभ दस्तावेजों को अस्थायी स्टोरेज में ले जाने से उनके खराब होने या खोने का खतरा बढ़ जाता है। जब कोई कलेक्शन स्टोरेज में रखा होता है, तो अधिकारियों और रिसर्च करने वालों की रिकॉर्ड्स तक पहुंच भी नहीं हो पाती है।
कौन करता है इसकि सुरक्षा का काम
लाइब्रेरी का मंत्रालय इसके लिए जिम्मेदार होता है। पहले ये लाइब्रेरी शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत थी बाद में इसे संस्कृति मंत्रालय को दे दिया गया।
कलेक्शन प्रोटोकॉल का क्या होता है नियम
जिन इमारतों में आर्काइव (पुराने दस्तावेज) रखे हों, उन्हें खाली करने से पहले कैटलॉगिंग और क्लाइमेट-कंट्रोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था करना जरूरी शर्त होनी चाहिए।
पहले डिजिटाइज करें- किसी भी जगह से सामान हटाने से पहले दुर्लभ और नाज़ुक चीजों को डिजिटाइज किया जाना चाहिए।
तुलसी सदन को फिर से खोलें- तुलसी सदन लाइब्रेरी को फिर से खोलने के लिए एक समय-सीमा वाला प्लान बनाएं।
CSL को दूसरी जगह ले जाने का मामला दिखाता है कि रीडेवलपमेंट के प्लान में उन संस्थानों से पहले ही नई इमारतें बनाने की योजना बना ली गई थी, जिन्हें उनमें आना था। शास्त्री भवन खाली होने से पहले लाइब्रेरी को पक्की जगह मिलती है या नहीं, इससे पता चलेगा कि सेंट्रल विस्टा अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचता है या नहीं।
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