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16 मिनट पहले
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आज के समय में एक 55 साल का टीचर अगर रोज घने जंगलों, बारिश, खूंखार जंगली जानवरों और कच्चे रास्तों से बीच सिर्फ एक छात्रा को पढ़ाने स्कूल जाता है तो यह बात किसी आश्चर्य से कम नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र के 55 वर्षीय जीवन मिथारी ऐसे ही टीचर है जो रोज पांच किलोमीटर की पैदल यात्रा करके दूर-दराज के गांव में स्थित स्कूल पहुंचते हैं।
जीवन मिथारी कोल्हापुर जिले में गगनबावड़ा तालुका स्थित ‘कवलटेक धनगरवाड़ा’ के जिला परिषद स्कूल में पिछले 13 साल से टीचर हैं। सिंधुदुर्ग सीमा से सटे इस बेहद दुर्गम गांव में न तो बिजली है और न ही गाड़ियों के जाने का कोई रास्ता।
13 साल से बीहड़ स्कूल में ले रहे क्लास
मिथारी के अनुसार, मैं 26 जुलाई 2013 को पहली बार इस स्कूल में आया थाा। तब से लगातार यहीं पढ़ा रहा हूं। हालांकि पहले छात्रों की संख्या ज्यादा थी। कवलटेक धनगरवाड़ा और आसपास के इलाकों में करीब 70–100 परिवार रहते थे।
रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग यह गांव छोड़कर शहर चले गए। इस तरह स्कूल में बच्चों की संख्या लगातार कम होती गई। अब स्कूल में आधिकारिक तौर पर सिर्फ एक छात्रा पढ़ती है जिसका नाम स्वरा है।
स्वरा की छोटी बहन भी उसके साथ स्कूल आती है, क्योंकि गांव में आंगनवाड़ी केंद्र नहीं है। वह अगले साल कक्षा 1 में जाएगी। तब रोज स्कूल में पढ़ने भी आया करेगी।

वन अधिकारियों से मिथारी को किया सचेत
मिथारी का कहना है कि इस पांच किमी स्कूल तक पैदल आने जाने के दौरान उन्हें वन्यजीवों के इलाके से होकर गुजरना पड़ता है। एक बार बस्ती के पास एक तेंदुए ने एक बछड़े को मार दिया था। इसके बाद वन विभाग के अधिकारियों ने वहां ट्रैप कैमरा लगाया, जिसमें तेंदुए की सैकड़ों तस्वीरें कैद हुईं। वन अधिकारियों ने मिथारी को भी सलाह दी थी कि स्कूल जाते और लौटते समय रास्ते में कहीं भी रुकें या बैठें नहीं।
ताने को चुनौती माना और तबादला कराया
जीवन मिथारी पहले कोल्हापुर जिला प्राथमिक शिक्षक सहकारी बैंक के अध्यक्ष थे। उनके साथियों ने एक बार तंज किया कि रसूखदार शिक्षक हमेशा सुविधायुक्त इलाकों में नियुक्ति ले लेते हैं, जबकि अन्य टीचर्स को दुर्गम क्षेत्रों में भेज दिया जाता है। इस ताने को चुनौती की तरह लेते हुए मिथारी ने खुद अपना तबादला इस गांव में करवाया और तब से यही टीचर हैं।

सबसे पास स्कूल 11 KM दूर है
इस छोटे से गांव में बच्चों के लिए दूसरे स्कूल में जाना आसान नहीं है। धुंडावाडे में सबसे नजदीकी स्कूल करीब 5.5 किलोमीटर दूर है। अगर बच्चे रोज उस स्कूल में जाएंगे तो उन्हें करीब 11 किलोमीटर की यात्रा करनी होगी। मानसून के दौरान यह सफर और भी मुश्किल हो जाता है।
यहां के लोग मुख्य रूप से छोटी खेती, जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने और जामुन व करवंद जैसे जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर हैं। किसान अपनी फसलों को गौरों से बचाने के लिए दोहरी बाड़ लगाते हैं। ऐसी दूरदराज की बस्ती में यह स्कूल बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत अहम है।
जीवन मिथारी मई 2029 में रिटायर होने वाले हैं। रिटायरमेंट से पहले वे चाहते हैं कि स्कूल के बच्चों की सुरक्षा के लिए परिसर के चारों ओर चारदीवारी बनें।
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