पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों के 77 सदस्यीय एक समूह ने एक खुला पत्र लिखकर विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के हस्तांतरण के कारण बड़े पैमाने पर हो रही वनों की कटाई को लेकर चिंता जताई है। बुधवार को जारी इस पत्र में कहा गया है कि केंद्र ने 2014-15 से 2025-26 के बीच करीब 2.15 लाख हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वनीय उपयोग के लिए हस्तांतरित करने की मंजूरी दी। इसमें करीब 62 प्रतिशत भूमि खनन, पनबिजली, सिंचाई और सड़क परियोजनाओं के लिए मंजूर की गई।
पत्र में कहा गया है, ‘‘वन भूमि के हस्तांतरण के मामले हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। 2014-15 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों में 74,705.68 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी गई। इसके बाद 2019-20 से 2023-24 के पांच साल की अवधि में यह आंकड़ा करीब 29 प्रतिशत बढ़कर 96,112.90 हेक्टेयर हो गया।’’
पत्र में कहा गया कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों यानी संरक्षित क्षेत्रों (पीए) तथा उनके पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसजेड) की भूमि भी ‘‘चिंताजनक गति’’ से हस्तांतरित की जा रही है।
संरक्षित क्षेत्रों के भीतर भूमि हस्तांतरण के प्रस्तावों के लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (एससी-एनबीडब्ल्यूएल) की मंजूरी जरूरी होती है। यह एक वैधानिक निकाय है, जिसका काम वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण, संवर्धन तथा विकास को बढ़ावा देना है। पत्र के अनुसार, ‘‘हालांकि, यह देखा गया है कि 2014 के बाद से एससी-एनबीडब्ल्यूएल के समक्ष रखे गए भूमि हस्तांतरण के 97 प्रतिशत प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है।
2024 और 2025 में हुई केवल चार बैठकों में ही संरक्षित क्षेत्रों और पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर 5,824 हेक्टेयर भूमि को गैर-वनीय उपयोग के लिए मंजूरी दी गई। लगभग हर बैठक में 100 से अधिक प्रस्तावों को मंजूरी मिली।’’
पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि पिछले एक दशक में 30 से अधिक वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों को अधिसूचित दर्जे से बाहर कर दिया गया या उनका क्षेत्रफल काफी कम कर दिया गया, ताकि विकास परियोजनाओं के लिए उनकी भूमि का हस्तांतरण आसानी से किया जा सके। इसमें ग्रेट निकोबार के मेगापोड वन्यजीव अभयारण्य और गैलाथिया बे वन्यजीव अभयारण्य भी शामिल हैं।
इसके अलावा, पूर्व नौकरशाहों ने पत्र में कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी के बाद उल्लंघनों को नियमित करने से संबंधित जुलाई में उच्चतम न्यायालय के फैसले से भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, क्योंकि इसके तहत केंद्र को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा तीन के तहत उल्लंघनों को नियमित करने की अनुमति मिलती है। उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया था कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत बाद में जारी वैध वैधानिक अधिसूचना के जरिए अधिकृत किए जाने की स्थिति में पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी कानूनी रूप से स्वीकार्य हो सकती है। पत्र में कहा गया, ‘‘अदालत के फैसले ने भारत के पर्यावरण से जुड़े मामलों में ‘एहतियाती सिद्धांत’ की जगह प्रभावी रूप से ‘प्रदूषण करो और भुगतान करो’ मॉडल ला दिया है।
उद्यमी जरूरी पूर्व मंजूरियां लिए बिना बड़ी परियोजनाएं खड़ी कर सकते हैं, सरकार के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं जिसे बाद में पलटना मुश्किल हो और केवल मुआवजा देकर अपना संचालन जारी रख सकते हैं।’’
पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने सरकार और न्यायपालिका से विकास परियोजनाओं के मुकाबले देश की पारिस्थितिक सुरक्षा तथा नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
