दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्रीय सचिवालय क्लब की मान्यता रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार का रुख जानना चाहा। पहले ‘तालकटोरा क्लब’ के नाम से जाने जाने वाले इस क्लब ने ‘संपदा अधिकारी’ के उस बेदखली आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें उसे ‘प्रेसिडेंट्स एस्टेट’ में अपनी मौजूदा जगह को तुरंत खाली करने के लिए कहा गया था। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा।
याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील ने अदालत से मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देने का आग्रह किया और कहा कि अगर ऐसी सुरक्षा नहीं दी गई तो “कुछ भी नहीं बचेगा”। इस अनुरोध को ठुकराते हुए न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, “मुझे ऐसा नहीं लगता। इसे 24 अगस्त की सूची में शामिल करें।”
क्लब ने अपनी याचिका में कहा कि 14 जुलाई को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने मनमाने, गैर-कानूनी और असंवैधानिक तरीके से उसे दी गई मान्यता वापस ले ली।
याचिकाकर्ता ने कहा कि कामकाज संभालने वाली तदर्थ समिति के कार्यकाल के दौरान हुई अनियमितताओं के बारे में उनकी शिकायतों पर सुधारात्मक कार्रवाई करने के बजाय, अधिकारियों ने पहले बिना कोई कारण बताओ नोटिस जारी किए फरवरी में मान्यता रद्द कर दी। उच्च न्यायालय के दखल के बाद, याचिकाकर्ता की सुनवाई हुई और 14 जुलाई को मान्यता रद्द करने का नया आदेश जारी किया गया। याचिका में यह तर्क दिया गया कि 14 जुलाई का मान्यता रद्द करने का आदेश और 17 जुलाई का बेदखली का आदेश “साफ तौर पर मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक था, और यह प्रशासनिक शक्तियों का बेशर्मी भरा और मनमाना इस्तेमाल था।”
इसमें कहा गया, “प्रतिवादी अपनी ही प्रशासनिक नाकामियों और अपनी तदर्थ समिति की गलत हरकतों का इस्तेमाल करके एक ऐतिहासिक संस्थान को जबरदस्ती खत्म करने और उससे बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं; यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।”
याचिका में आरोप लगाया गया है कि बेदखली का आदेश मनमाने ढंग से 107 साल पुरानी ऐतिहासिक संस्था—जिसे स्थायी कब्जा दिया गया था—को सिर्फ आवंटन रद्द करने की गैर-कानूनी कार्रवाई के आधार पर “अनधिकृत कब्जेदार” मानता है।
