रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश के लिए कूटनीति और सैन्य क्षमताओं के बीच संतुलन जरूरी होने पर जोर देते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि भारत के पास “तर्क की शक्ति” के साथ-साथ “शक्ति का तर्क” भी है और जरूरत पड़ने पर भारत उसी में जवाब देगा, जिसे दूसरा पक्ष समझता है। यहां आयोजित एक रक्षा सम्मेलन (डिफकॉन) को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा कि “सॉफ्ट पावर, हार्ड पावर की पूरक हो सकती है”, लेकिन किसी भी स्थिति में वह उसका विकल्प नहीं हो सकती। सिंह ने कहा कि भारत की परंपरा में शक्ति और शांति कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद “समस्या” तब शुरू हुई, जब देश का नेतृत्व कर रहे कुछ नेताओं ने इन दोनों विचारों को साथ लेकर चलने के बजाय “शक्ति और नैतिकता को एक-दूसरे का विकल्प मान लिया।”
उन्होंने दावा किया कि 1960 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद “स्वीकार किया था कि हम वास्तविकता से कट गए थे और अपने ही बनाए एक काल्पनिक माहौल में जी रहे थे।”
रक्षा मंत्री ने बिना किसी का नाम लिए आरोप लगाया, “बाद में देश का नेतृत्व करने वाले कई अन्य नेताओं ने इससे कोई सबक नहीं लिया और अपनी रणनीति में बदलाव नहीं किया।’’
उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह था कि लंबे समय तक भारत का नेतृत्व करने वाले कुछ लोगों ने यह मान लिया था कि “जिस तरह भारत शांति के पक्ष में है, उसी तरह दूसरे देश भी शांति के पक्ष में हैं।”
न्यूज18 नेटवर्क द्वारा आयोजित ‘डिफकॉन’ में सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस सोच में “बड़ा बदलाव” आया है। उन्होंने कहा, “हमने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के पास तर्क की शक्ति भी है और शक्ति का तर्क भी। इसलिए जरूरत पड़ने पर हम उसी में जवाब देंगे, जिसे दूसरा पक्ष समझता है।”
उन्होंने कहा, “आज हम कूटनीति के माध्यम से दुनियाभर में शांति को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।
साथ ही, किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अपनी रक्षा और रणनीतिक क्षमताओं को भी मजबूत कर रहे हैं।”
रक्षा मंत्री ने कहा, “हम लोकतंत्र और कूटनीति के माध्यम से समाधान के पक्षधर हैं। लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए निर्णायक कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेंगे और जरूरत पड़ने पर ऐसा करते भी हैं।”
उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट स्ट्राइक और पिछले साल किए गए ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के पास अपनी सुरक्षा के लिए “जरूरी क्षमताएं” भी हैं और उनका इस्तेमाल करने की “इच्छाशक्ति” भी।
