बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए शायद यह सोचा होगा कि उन्होंने आकाश आनंद की राजनीति शुरू होने से पहले ही खत्म कर दी, लेकिन बसपा से बाहर निकलते ही तस्वीर बदल गई। उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक वर्ग बांहें फैलाकर आकाश आनंद का इंतजार करता दिखाई दे रहा है। सत्तापक्ष एनडीए के सहयोगी दलों से लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन आंदोलन की राजनीति करने वाले नेताओं तक, हर कोई आकाश आनंद को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गया है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई यह कवायद बताती है कि निशाना भले ही आकाश आनंद हों, लेकिन असली नजर उस बहुजन सामाजिक आधार पर है, जिसे बसपा ने दशकों में तैयार किया है। मायावती भले ही चुनावी गठजोड़ से लगातार दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन आकाश के बहाने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन वोट की नई गोलबंदी की संभावनाएं तलाशने का खेल शुरू हो चुका है।
सबसे पहले निषाद पार्टी के मुखिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी संजय निषाद ने आकाश आनंद को खुला न्योता दिया। उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर और कांशीराम से जुड़े बहुजन आंदोलन के पुराने नारे का हवाला देते हुए आकाश से आगे आने और अपनी टीम के साथ मुख्यधारा में शामिल होकर कांशीराम के सपने को पूरा करने की अपील की। यानी मामला महज एक नेता को पार्टी में शामिल करने का नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति की विरासत को अपने राजनीतिक खेमे में जोड़ने की कोशिश का है।
उधर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। खास बात यह है कि दोनों नेताओं के बीच पहले तल्खियां रही हैं। इसके बावजूद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अगर आकाश बहुजन मिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उनकी पार्टी में आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है और दोनों साथ काम करेंगे।
लेकिन असली दिलचस्पी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रुख में है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने मायावती पर भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का आरोप भी लगाया और कहा कि आकाश आनंद ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बात की थी। यह बयान बताता है कि कांग्रेस भी इस घटनाक्रम को महज बहुजन समाज पार्टी का अंदरूनी मामला मानकर नहीं चल रही है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का जवाब तो और भी सीधा था। जब उनसे पूछा गया कि क्या आकाश आनंद को समाजवादी पार्टी में जगह दी जाएगी, तो उन्होंने कहा कि अगर उन्हें उनके पास लाया जाता है तो वे उन्हें ले लेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला बहुजन समाज पार्टी का है और दूसरी पार्टियों के लोग उस पर कुछ नहीं कह सकते।
यहां सवाल उठता है कि आखिर आकाश आनंद को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? जवाब उत्तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों में छिपा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 22.23 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 19 विधायक जीते थे। वर्ष 2022 में मत प्रतिशत घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर बदली। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को करीब 19.43 प्रतिशत मत और 10 सीटें मिली थीं, जबकि वर्ष 2024 में मत प्रतिशत करीब 9.39 प्रतिशत रह गया और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।
इसके बावजूद बहुजन समाज पार्टी का सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर जाटव समेत दलित मतदाताओं के एक हिस्से पर पार्टी का प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर दल अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के लिए संभावित रास्ते तलाश रहा है।
इस पूरी कवायद की जड़ में मायावती का 10 सितंबर का फैसला है। इससे पहले 3 सितंबर को आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक की अहम जिम्मेदारी से हटाया गया था। इसके बाद उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की। इसके बावजूद मायावती ने आकाश को पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया। मायावती ने आकाश पर पार्टी और आंदोलन के मुकाबले पारिवारिक संबंधों को ज्यादा महत्व देने का आरोप लगाया और उनके रुख को लेकर सवाल उठाए।
दिलचस्प बात यह भी है कि आकाश आनंद का राजनीतिक सफर खुद उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। मायावती ने उन्हें दिसंबर 2023 में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। इसके बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं, फिर हटाया गया, दोबारा जिम्मेदारी दी गई और फिर बाहर किया गया। अब एक बार फिर वे पार्टी से बाहर हैं।
उधर, मायावती लगातार चुनावी गठबंधन से इंकार करती रही हैं। ऐसे में 2027 की लड़ाई में दूसरे दलों के सामने सवाल है कि बहुजन समाज पार्टी के साथ सीधे तालमेल का रास्ता बंद है तो उसके सामाजिक आधार तक पहुंचने का रास्ता क्या हो? आकाश आनंद को लेकर दिखाई दे रही राजनीतिक हलचल शायद इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है।
बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहानी सिर्फ मायावती बनाम आकाश आनंद की नहीं रह गई है। अब यह सवाल बहुजन राजनीति की अगली दिशा का भी है। आकाश आनंद किसके साथ जाएंगे, जाएंगे भी या नहीं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि मायावती के दरवाजे से बाहर निकलते ही कई सियासी दरवाजे उनके लिए खुल गए हैं और 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में बहुजन वोट की बाजी पर दांव शुरू हो चुका है।
-नीरज कुमार दुबे
