जस्टिस शील नागू ने पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें CBI को मुख्यमंत्री भगवंत मान के ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में आपराधिक केस दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई संबंधित जज किसी मामले से खुद को अलग नहीं करता है, तो यह पता नहीं चल पाएगा कि हमला कहाँ से होगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 5 अक्टूबर के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करनी थी, लेकिन गुरुवार को कुछ याचिकाकर्ताओं के साथ जस्टिस नागू के पिछले न्यायिक मामलों का मुद्दा उठने के बाद उन्होंने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। इस मामले में पेश हुए सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता ने कहा कि जस्टिस नागू द्वारा पहले देखे गए मामले मौजूदा कार्यवाही से संबंधित नहीं थे, जिसके बाद जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की, “ये बहुत मुश्किल समय है। कोई नहीं जानता कि हमला कहाँ से होगा।
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जस्टिस दत्ता ने कहा नहीं, नहीं। ये बहुत मुश्किल समय है। कोई नहीं जानता कि हमला कहाँ से होगा। 17 अन्य बेंच हैं और यह किसी भी अन्य बेंच के पास जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मामले को किसी दूसरी बेंच को सौंपा जा सकता है। पंजाब सरकार की ओर से पेश हुए सीनियर वकील विकास सिंह ने सुझाव दिया कि इस मामले को सोमवार को लिस्ट किया जाए। उन्होंने कहा, “तो फिर इस मामले को सोमवार को ही देखा जाए। जस्टिस दत्ता ने जवाब दिया हम तुरंत इस आदेश पर साइन कर देंगे। यह कदम तब उठाया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस नागू को केस के कागज़ात देखने का मौका देने के लिए राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई एक दिन के लिए टाल दी थी। गुरुवार को सिंह ने CBI और एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) को इस मामले में आगे कोई कदम उठाने से रोकने के लिए अंतरिम आदेश की मांग की थी, लेकिन जस्टिस दत्ता ने अपने साथी जज को याचिका देखने का मौका दिए बिना इस अनुरोध पर विचार करने से इनकार कर दिया।
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सिंह ने यह भी बताया था कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर काम करते हुए जस्टिस नागू ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में शामिल दो याचिकाकर्ताओं पंजाब के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस गौरव यादव और राज्य के चीफ डायरेक्टर से जुड़े कुछ मामलों पर सुनवाई की थी। सिंह ने साफ़ किया कि पिछली कार्यवाही का मौजूदा मामले से कोई लेना-देना नहीं था, जबकि जस्टिस नागू ने कहा कि वे यह तय करने से पहले फ़ाइल देखेंगे कि क्या वे इस मामले की सुनवाई कर सकते हैं। पंजाब सरकार के लिए चुनौती तब खड़ी हुई जब हाई कोर्ट ने 5 अक्टूबर को CBI को मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने कहा था कि ED द्वारा दी गई जानकारी से शुरुआती तौर पर वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत का संकेत मिलता है और उसने CBI को दो महीने के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।
CBI ने 251 पन्नों की FIR दर्ज की, जिसमें भगवंत मान के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) राजबीर सिंह घुमन और पांच अन्य लोगों को नामजद किया गया। आरोप है कि वे रिश्वत के बदले सरकारी पोस्टिंग, प्रशासनिक फैसलों, टेंडर, लाइसेंस और अन्य आधिकारिक प्रक्रियाओं में हेरफेर करने का नेटवर्क चलाते थे। एजेंसी ने पंजाब में आठ जगहों पर तलाशी भी ली। यह मामला ED द्वारा 24 जुलाई से 12 अगस्त के बीच पंजाब के DGP गौरव यादव को भेजे गए उन संदेशों से जुड़ा है, जिनमें घुमन और अन्य लोगों से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया गया था। हाई कोर्ट ने CBI को कार्रवाई का निर्देश तब दिया जब एक जनहित याचिका में आरोप लगाया गया कि राज्य पुलिस केंद्रीय एजेंसी द्वारा दी गई जानकारी पर कार्रवाई करने में विफल रही है।
