एमपी के रायसेन जिले में गैरतगंज तहसील में आने वाले देवनगर में स्कूल जाती छात्राओं का वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में बच्चे कीचड़ भरे रास्ते से स्कूल की तरफ जा रहे हैं और उनकी पीठ पर स्कूल बैग हैं और ये इन बच्चों का आम रास्ता है। कीचड़ भरे रास्ते से रोज जाते हैं स्कूल वे आगे जाकर पहले पानी ढूंढते हैं ताकि अपने पैर साफ कर सकें उसके बाद ही स्कूल तक पहुंच पाते हैं। इसी वजह से इन बच्चों ने पैरों में किसी भी तरह की कोई चप्पल या जूते भी नहीं पहन रखे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक बच्चे रोज इसी तरह स्कूल जाने को मजबूर हैं, कई बार वे फिसलकर गिर पड़ते हैं और चोटिल हो जाते हैं। इसी मुश्किल रास्ते की वजह से कई बार छोटे बच्चों का स्कूल जाना कठिन हो जाता है। खतरनाक रास्ते से जाने की वजह से सांप-बिच्छू के काटने का भी खतरा रहता है। स्कूल टीचर भी कर चुके हैं सड़क की मांग वहीं स्कूल टीचर का कहना है कि कई बार वे इसकी शिकायत कर चुकी हैं और पंचायत प्रशासन से सड़क बनाने के लिए आवेदन भी दे चुके हैं लेकिन अभी तक कोई भी हल नहीं निकला है। वहीं ग्रामीणों को कहना है कि सरपंच से कई बार इसकी शिकायत कर चुके हैं कि बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती है। साथ ही आम लोगों को भी आने-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन सरपंच का कहना है कि वो रोड नहीं बनवाएगा। बिहार में 25 सालों से पुल की मांग ये सिर्फ एमपी के के गांव की तस्वीर नहीं है ऐसा ही एक वीडियो देशभर से आ रहे हैं। बिहार के गया जिले के मानपुर प्रखंड में कईया गांव का है। जहां बच्चे घुटने तक पानी पार करकर स्कूल जा रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, यहां एक तरफ नदी है और एक तरफ नहर लेकिन कोई पुल नहीं है। इस वजह से बच्चों को रोज इसी तरह स्कूल जाना पड़ता है। 3 महीने में 3 हफ्ते ही स्कूल जा पा रहे बच्चे ग्रामीणों की शिकायत है कि बच्चे बारिश के समय कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते हैं क्योंकि पानी बढ़ जाता है और न रोड है न पुल है। जिससे बच्चों के डूबने का खतरा होता है इसलिए बच्चे 3 महीने की बारिश में हफ्ते में 1-2 दिन ही स्कूल जा पाते हैं, उन्हें मजबूरी में क्लास छोड़नी पड़ती हैं। ‘डीएम साहब हमारे स्कूल की रोड बनवा दीजिए’ ऐसा ही एक ओर वीडियो वायरल हो रहा है, दावा है कि ये वीडियो एमपी के बुरहानपुर जिले के देवला ग्राम पंचायत का है। इस वीडियो में बच्चे कीचड़ में सिर पर किताबें लेकर स्कूल से वापस घर की तरफ आ रहे हैं। इस वीडियो में बच्चे अपना स्कूल दिखा रहे हैं और कह रहे हैं ‘डीएम साहब हमारे स्कूल की रोड बनवा दीजिए, वो हमारा स्कूल है, स्कूल जाने में दिक्कत होती है। ‘ शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के मुताबिक शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act 2009) के सेक्शन 6 के तहत बच्चों के स्कूल की दूरी के स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। साथ ही रास्ते पर बेहतर रोशनी और पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ होना चाहिए।
————————– मिड डे मील में कहीं कीड़े, कहीं सड़े आलू:आरोप छात्रों से प्रिंसिपल कहते हैं- शिकायत की तो केस कर देंगे, देशभर के कई राज्यों के मामले एमपी के छिंदवाड़ा के मानेगांव में स्कूली बच्चों के मध्यान भोजन यानी मिड डे मील में खाने की गुणवत्ता, सामग्री और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पूरी खबर पढ़ें..
कहीं कीचड़ में स्कूल जाते बच्चे, कहीं घुटनों तक पानी:कहीं फिसलन, कहीं सांप-बिच्छू तो, कहीं पानी में डूबने का खतरा; वीडियो वायरल
सिद्धभूमि के लेखक एक प्रमुख समाचार लेखक हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी जानकारी और विश्लेषण प्रदान किया है। उनकी लेखनी न केवल तथ्यात्मक होती है, बल्कि समाज की जटिलताओं को समझने और उजागर करने की क्षमता रखती है। उनके लेखों में तात्कालिक घटनाओं के विस्तृत विश्लेषण और विचारशील दृष्टिकोण की झलक मिलती है, जो पाठकों को समाज के विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
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सिद्धभूमि -
एक ऐसे समय में जब प्रिंट एवं मुद्रण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था ,समाचार पत्र अपने संसाधनो के बूते निकाल पाना बेहद दुष्कर कार्य था ,लेकिन इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” ने 12 मार्च 1978 को पडरौना (कुशीनगर ) उत्तर प्रदेश से सिद्ध भूमि हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया | स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” सीमित साधनों व अभावों के बीच पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाले पत्रकार थे । उनका मानना था कि पत्रकारिता राष्ट्रीय लोक चेतना को उद्वीप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा ही जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखा जा सकता है । किसी भी संस्था के लिए चार दशक से अधिक का सफ़र कम नही है ,सिद्ध भूमि ने इस लम्बी यात्रा में जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखते हुए कर्मपथ पर अपने कदम बढ़ाएं हैं और भविष्य के लिए भी नयी आशाएं और उम्मीदें जगाई हैं । ऑनलाइन माध्यम की उपयोगिता को समझते हुए सिद्ध भूमि न्यूज़ पोर्टल की शुरुवात जुलाई 2013 में किया गया |
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