आज जब पूरा देश पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, तब हर भारतीय के मन में उनकी मुस्कुराती छवि, ओजस्वी आवाज़ और मानवीय संवेदनाओं से भरा व्यक्तित्व एक बार फिर जीवंत हो उठता है। देखा जाये तो भारतीय राजनीति में ऐसे नेता विरले ही हुए हैं, जिनकी लोकप्रियता केवल अपनी पार्टी तक सीमित न रहकर राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर गई हो। सुषमा स्वराज उन्हीं असाधारण नेताओं में थीं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संसद हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, उनके शब्दों में दृढ़ता थी, विचारों में स्पष्टता थी और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी, जिसने उन्हें हर दल के नेताओं और करोड़ों भारतीयों का सम्मान दिलाया। छह अगस्त 2019 को 67 वर्ष की आयु में उनके निधन ने भारतीय राजनीति को एक ऐसी आवाज़ से वंचित कर दिया, जिसकी कमी आज भी महसूस की जाती है।
सुषमा स्वराज का अंतिम सार्वजनिक संदेश भी उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी वैचारिक प्रतिबद्धताओं में से एक का प्रतीक बन गया। छह अगस्त 2019 की शाम 7:23 बजे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए ट्वीट लिखा था, “धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। मैं अपने जीवनकाल में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।” यह संदेश जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ऐतिहासिक निर्णय पर उनकी प्रतिक्रिया थी। भारतीय जनता पार्टी वर्षों से जिस संकल्प को लेकर आगे बढ़ रही थी, उसे पूरा होते देखना उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक इच्छाओं में शामिल था। विडंबना देखिए कि इस ऐतिहासिक क्षण पर खुशी व्यक्त करने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें हृदयाघात हुआ और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। यह संयोग उनके जीवन को एक भावनात्मक पूर्णविराम देता है।
हरियाणा के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी सुषमा स्वराज ने ऐसे दौर में राजनीति में अपनी पहचान बनाई, जब यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था। हरियाणा में मात्र 25 वर्ष की आयु में वह भारत की सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनीं और 27 वर्ष की उम्र में राज्य में जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व संभाला। बाद के वर्षों में वह लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, लोकसभा में विपक्ष की दूसरी महिला नेता रहीं और भारत की पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री बनने का गौरव भी हासिल किया। उनका राजनीतिक सफर केवल पदों की सूची नहीं था, बल्कि उन तमाम सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं को तोड़ने की कहानी था, जिन्हें लंबे समय तक महिलाओं के सामने अजेय माना जाता रहा।
सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी पहचान उनकी अद्भुत वक्तृत्व कला थी। संसद में उनके भाषण केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं होते थे, बल्कि उनमें इतिहास, संस्कृति, तर्क और संवेदना का अनूठा संगम दिखाई देता था। वर्ष 1996 में लोकसभा में दिया गया उनका “धर्मनिरपेक्षता” पर भाषण आज भी भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे चर्चित भाषणों में गिना जाता है। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि यदि वंदे मातरम् का सम्मान करना, राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा की रक्षा करना, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की मांग करना और समान नागरिक संहिता की वकालत करना सांप्रदायिकता है, तो वे स्वयं को सांप्रदायिक कहने से नहीं हिचकेंगी। लेकिन इसी भाषण में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा भी दी कि एक अच्छा हिंदू, अच्छा मुसलमान, अच्छा सिख और अच्छा ईसाई वही है, जो अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे धर्मों का भी समान सम्मान करे। उनके इस दृष्टिकोण ने वैचारिक बहस को नई दिशा दी और विरोधी दलों के कई नेताओं ने भी उनकी तार्किक क्षमता की सराहना की।
भारतीय संस्कृति की उनकी व्याख्या भी उतनी ही प्रभावशाली थी। जब संसद में भारतीयता की अवधारणा पर प्रश्न उठे, तब उन्होंने भांगड़ा से भरतनाट्यम तक, राजमा-चावल से इडली-दोसा तक और अमरनाथ से रामेश्वरम तक की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि विविधताओं के बीच यही एकता भारत की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यही वह संस्कृति है, जिसमें कश्मीर का श्रद्धालु अमरनाथ का जल लेकर रामेश्वरम में भगवान शिव का अभिषेक करता है। उनके इन शब्दों ने भारतीय सांस्कृतिक एकता की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की, जिसे आज भी याद किया जाता है।
हालांकि सुषमा स्वराज की सबसे अलग पहचान विदेश मंत्री के रूप में बनी। वर्ष 2014 में जब उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, तब कई लोगों को लगा कि विदेश नीति का पूरा केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय ही रहेगा। लेकिन उन्होंने अपने काम और संवेदनशीलता से यह धारणा बदल दी। उन्होंने विदेश मंत्रालय को आम भारतीय के जीवन से जोड़ दिया। सोशल मीडिया मंच ट्विटर को उन्होंने केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संकट में फंसे भारतीयों के लिए जीवनरेखा बना दिया। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भारतीय मुश्किल में होता, तो लोग सीधे उन्हें टैग करते और कुछ ही समय में उनकी ओर से प्रतिक्रिया आ जाती। चाहे जर्मनी के शरणार्थी शिविर में फंसी गुरप्रीत कौर हों, पाकिस्तान में जबरन विवाह का शिकार बनी उज्मा हों, मूक-बधिर गीता की स्वदेश वापसी हो या पाकिस्तान में फंसे हमीद अंसारी का मामला, हर जगह सुषमा स्वराज ने मानवीय संवेदनाओं के साथ हस्तक्षेप किया।
उनकी कार्यशैली इतनी सक्रिय थी कि उन्होंने स्वयं कहा था, “मैं न सोती हूँ और न ही भारतीय दूतावासों के अधिकारियों को सोने देती हूँ।” उनके एक संदेश पर दुनिया के किसी भी देश में भारतीय दूतावास तत्काल सक्रिय हो जाता था। यही कारण था कि भारतीय राजनयिक अपने मोबाइल फोन हर समय चालू रखते थे। विदेश मंत्रालय को उन्होंने पहली बार ऐसा मानवीय चेहरा दिया, जहां फाइलों से पहले इंसान की पीड़ा को महत्व मिला। उनकी हाजिरजवाबी भी लोगों को बेहद पसंद थी। एक बार किसी व्यक्ति ने ट्विटर पर खराब रेफ्रिजरेटर की शिकायत कर दी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “भाई, मैं रेफ्रिजरेटर के मामले में आपकी मदद नहीं कर सकती। मैं इस समय संकट में फंसे इंसानों की मदद में बहुत व्यस्त हूँ।”
विदेश नीति के स्तर पर भी उनके कार्यकाल में भारत ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की कानूनी सफलता, डोकलाम विवाद के दौरान संतुलित कूटनीति, मालदीव संकट और नेपाल से जुड़े चुनौतीपूर्ण हालात का प्रबंधन, इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) की बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व तथा पाकिस्तान के विरोध के बावजूद वहां भारत की प्रभावशाली उपस्थिति, ये सभी उपलब्धियां उनके नेतृत्व की गवाही देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख विदेश यात्राओं की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर चीन और किर्गिस्तान तक, उन्होंने परदे के पीछे रहकर भारतीय कूटनीति को मजबूती प्रदान की।
देखा जाये तो सुषमा स्वराज को केवल एक सफल राजनेता या कुशल प्रशासक के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वह ऐसी जननेता थीं, जिन्होंने राजनीति को मानवीय संवेदना से जोड़ा। उनकी वाणी में ओज था, विचारों में स्पष्टता थी, निर्णयों में राष्ट्रहित सर्वोपरि था और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी कि राजनीतिक विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। शायद यही कारण था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उन्हें भारत की सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार किया। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें केवल एक पूर्व विदेश मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उस जननेता के रूप में याद कर रहा है, जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया और करोड़ों भारतीयों के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली।
-नीरज कुमार दुबे