दिल्ली हाई कोर्ट ने 9 जून, 2026 के उस फ़ैसले और आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने सुजान सिंह पार्क (जहाँ एम्बेसडर होटल स्थित है) की प्रॉपर्टी को लेकर भारत सरकार के साथ लंबे समय से चल रहे विवाद में ‘सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड’ के पक्ष में आए 2009 के ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया था। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 10 अगस्त को सुनाए गए एक आदेश में दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे दूसरी अपील का निपटारा होने तक विवादित प्रॉपर्टी के मामले में यथास्थिति (status quo) बनाए रखें। कोर्ट ने केंद्र सरकार को 9 जून के फ़ैसले और आदेश पर कोई भी कार्रवाई करने से भी रोक दिया।
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यह विवाद सुजान सिंह पार्क में लगभग 7.58 एकड़ ज़मीन के लिए 8 अक्टूबर, 1945 को किए गए लीज़ एग्रीमेंट से जुड़ा है। कंपनी ने 1960 में सिविल कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था और प्रॉपर्टी पर सरकार के दोबारा कब्ज़ा करने के फ़ैसले को चुनौती दी थी। साथ ही, अन्य राहतों के अलावा, लीज़ एग्रीमेंट को पूरी तरह लागू करने (specific performance) की मांग भी की थी। यह कानूनी मामला छह दशकों से ज़्यादा समय से चल रहा है। आदेश में कहा गया है कि 1960 से ही प्रॉपर्टी पर कंपनी का कब्ज़ा सुरक्षित रहा है और 1943 से ही उसका लगातार कब्ज़ा रहा है।
यह विवाद मुख्य रूप से उस बिल्डिंग के निर्माण और इस्तेमाल से जुड़ा है जिसे कार्यवाही में “होटल ब्लॉक” कहा गया है। इसके अलावा, विवाद सर्वेंट्स क्वार्टर्स के कुछ हिस्सों और सर्वेंट्स ब्लॉक में मौजूद 31 गैराज के कथित गलत इस्तेमाल से भी जुड़ा है।
कंपनी का कहना है कि होटल ब्लॉक का निर्माण सरकारी अधिकारियों की जानकारी और मंज़ूरी से किया गया था। हाई कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत से पहली नज़र में यह पता चलता है कि निर्माण कार्य सक्षम सरकारी अधिकारियों की जानकारी और मंज़ूरी से किया गया था। कोर्ट ने 1951 में होटल के लिए दी गई बाद की मंज़ूरी (ex-post-facto sanction) पर भी ध्यान दिया।
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केंद्र सरकार ने ग्रांट की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया था और 1959 में कंपनी को इन उल्लंघनों को ठीक करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सरकार ने कंपनी को सूचित किया कि उसने 29 जुलाई 1960 से प्रॉपर्टी का कब्ज़ा वापस ले लिया है।
कंपनी ने इस कार्रवाई को सिविल कोर्ट में चुनौती दी। 2009 में, ट्रायल कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने अन्य बातों के अलावा यह माना कि बिल्डिंग का निर्माण सरकार के निर्देशों और आदेशों के अनुसार किया गया था और कथित गलत इस्तेमाल साबित नहीं हुआ था।
