म्यांमा से विस्थापित होने के बाद बांग्लादेश में कई शिविरों में शरण लेने वाले हजारों रोहिंग्या शरणार्थियों ने मंगलवार को रैली निकाली और अपने देश में सुरक्षित वापसी की मांग की। म्यांमा में नौ साल पहले रोहिंग्या समुदाय के लोगों के खिलाफ सरकार की कार्रवाई से भागकर ये लोग बांग्लादेश आए थे। प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रखाइन प्रांत में सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।
उन्होंने इस दिन को ‘‘रोहिंग्या नरसंहार दिवस की नौवीं बरसी’’ के रूप में मनाया। म्यांमा के रोहिंग्या जातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के 10 लाख से अधिक शरणार्थी अब दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले के आसपास बने विशाल शिविरों में रह रहे हैं। इनमें से अधिकतर लोग 2017 में बड़ी संख्या में सीमा पार कर बांग्लादेश आए थे।
उस समय बौद्ध बहुल म्यांमा में रोहिंग्या मुस्लिम विद्रोही समूह के हमले के बाद रखाइन में सुरक्षा बलों ने कार्रवाई शुरू की थी। बांग्लादेश सरकार ने इससे पहले कम से कम दो बार रोहिंग्या शरणार्थियों की स्वदेश वापसी शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका क्योंकि सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए किसी भी शरणार्थी ने वापस जाने की इच्छा नहीं जताई। बांग्लादेश का कहना है कि वह किसी को भी वापस जाने के लिए मजबूर नहीं करेगा।
इसी बीच, मंगलवार को बांग्लादेश में 15 देशों और यूरोपीय संघ के राजनयिक मिशनों ने रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए निरंतरत अंतरराष्ट्रीय समर्थन की अपील की। कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, आयरलैंड, इटली, जापान, कोसोवो, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन के राजनयिक मिशनों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि ‘‘करीब 12 लाख रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में रह रहे हैं’’ और करीब एक दशक से उन्हें शरण देने के लिए बांग्लादेश तथा वहां के लोगों की सराहना की। राजनयिक मिशनों ने रखाइन प्रांत में बढ़ते संघर्ष पर चिंता जताई और कहा कि बढ़ती मानवीय जरूरतें, नागरिक बुनियादी ढांचे पर हवाई हमले तथा सहायता एवं व्यापार पर प्रतिबंध संकट को और गंभीर बना रहे हैं तथा बांग्लादेश एवं पूरे क्षेत्र में लोगों के विस्थापन को बढ़ावा दे रहे हैं।
समूह ने कहा, ‘‘रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमा में अपने घरों में लौटने का अधिकार है। दुर्भाग्य से रखाइन में संघर्ष के साथ ही मानवीय जरूरतें बढ़ती जा रही हैं।
