भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत सामने आया है। करीब ढाई दशक में पहली बार ऐसा हुआ है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुख वैश्विक सूचकांक में किसी भी भारतीय कंपनी को शीर्ष 10 स्थानों में जगह नहीं मिली है। यह बदलाव केवल रैंकिंग का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका असर विदेशी निवेश के प्रवाह और भारतीय पूंजी बाजार पर भी पड़ सकता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार उभरते बाजारों के लिए दुनिया के सबसे प्रभावशाली सूचकांकों में शामिल एमएससीआई उभरते बाजार सूचकांक में भारत की सबसे बड़ी दो कंपनियां एचडीएफसी बैंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज अब क्रमशः 11वें और 12वें स्थान पर पहुंच गई हैं। मार्च महीने में ये दोनों कंपनियां सातवें और आठवें स्थान पर थीं। हाल के महीनों में इनके भारांश में लगातार कमी दर्ज की गई है।
गौरतलब है कि इस सूचकांक का उपयोग दुनिया भर के बड़े संस्थागत निवेशक निवेश संबंधी फैसलों के लिए करते हैं। ऐसे में किसी देश या कंपनी की हिस्सेदारी में बदलाव का सीधा असर निवेश प्रवाह पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस बार गिरावट की बड़ी वजह वैश्विक निवेशकों का कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों की ओर बढ़ता झुकाव माना जा रहा है।
बता दें कि भारत की कुल हिस्सेदारी घटकर 10.87 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले छह वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वर्ष 2024 में भारत ने इस सूचकांक के एक विस्तृत संस्करण में सबसे बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर ली थी, लेकिन बाद में चीन ने फिर से शीर्ष स्थान प्राप्त कर लिया था।
मौजूद जानकारी के अनुसार इस सूचकांक से जुड़े निष्क्रिय निवेश कोषों में 700 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति निवेशित है। ये कोष सूचकांक में होने वाले बदलावों के आधार पर अपने निवेश को स्वतः समायोजित करते हैं। ऐसे में यदि किसी देश की हिस्सेदारी घटती है तो इन कोषों को भी उस देश में अपने निवेश का अनुपात कम करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर केवल निष्क्रिय निवेश तक सीमित नहीं रहता है। सक्रिय निवेश प्रबंधकों के लिए भी भारत में निवेश कम करना अब पहले की तुलना में आसान हो सकता है, क्योंकि सूचकांक में भारत का भारांश कम होने से यह फैसला निवेश मानकों से बहुत अलग नहीं दिखाई देगा।
गौरतलब है कि यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब घरेलू निवेश प्रवाह में भी कुछ नरमी देखने को मिली है। भारतीय म्यूचुअल फंड संघ के आंकड़ों के अनुसार मई महीने में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश घटकर 22,908 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले एक वर्ष का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।
बता दें कि इसी दबाव को कम करने के लिए सरकार ने हाल के महीनों में कई कदम उठाए हैं। मई में सोना और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाया गया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से एक वर्ष तक सोने की खरीदारी से बचने की अपील की थी, ताकि विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सके।
मौजूद जानकारी के अनुसार सरकार ने 5 जून को विदेशी निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से कई सुधारों की घोषणा भी की है। इनमें सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को कर राहत देना, अधिक प्रकार के बांड निवेश के लिए उपलब्ध कराना और विदेशी मुद्रा जमा को बढ़ावा देने के लिए विशेष व्यवस्था शामिल हैं।
गौरतलब है कि भारत को एक प्रमुख वैश्विक बांड सूचकांक में शामिल किए जाने को लेकर भी फैसला आने वाला है। यदि भारत को इसमें जगह मिलती है तो अनुमानित 25 अरब डॉलर का नया विदेशी निवेश देश में आ सकता है। फिलहाल बाजार और नीति निर्माता दोनों की नजर इस निर्णय पर टिकी हुई है, क्योंकि इससे आने वाले वर्षों में भारत के पूंजी प्रवाह की दिशा तय हो सकती है।