6 अप्रैल को भाजपा के स्थापना दिवस पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा था कि भारतीय जनता पार्टी अपना यह वादा जरूर पूरा करेगी। अब उच्चतम न्यायालय द्वारा इस विषय पर की गयी ताजा टिप्पणी के बाद देश में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस एक बार फिर केंद्र में आ गयी है।
हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता को एक संवैधानिक आकांक्षा बताते हुए मुस्लिम व्यक्तिगत कानून शरियत आवेदन अधिनियम 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। यह मामला विशेष रूप से महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से जुड़ा हुआ है, जिसे याचिकाकर्ताओं ने भेदभावपूर्ण बताया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोल की पीठ ने इस जनहित याचिका पर केंद्र के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से जवाब मांगा है। यह याचिका पौलोमी पाविनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन की ओर से दाखिल की गई है। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से यह भी कहा कि वह ऐसी मुस्लिम महिलाओं को भी इस मामले में शामिल करें जो इन प्रावधानों से प्रभावित हैं।
शुरुआत में पीठ इस मामले में हस्तक्षेप को लेकर संकोच में थी। न्यायालय का कहना था कि यदि शरियत कानून के किसी प्रावधान को हटाया या बदला जाता है तो यह न्यायिक कानून निर्माण के दायरे में आ सकता है, जो संसद का अधिकार है। लेकिन बाद में जब यह तर्क दिया गया कि यह प्रावधान महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है, तब अदालत ने मामले की सुनवाई पर सहमति दी।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान शरियत उत्तराधिकार नियम महिलाओं के साथ स्पष्ट रूप से भेदभाव करते हैं, जिसमें उन्हें पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलता है। प्रशांत भूषण ने दलील दी कि उत्तराधिकार जैसे मामले नागरिक प्रकृति के होते हैं और इन्हें धर्म के आवश्यक आचरण के रूप में नहीं माना जा सकता, इसलिए इन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
हम आपको बता दें कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन रखा गया है। इस संदर्भ में यह तर्क दिया गया कि महिलाओं के संपत्ति अधिकार को धार्मिक प्रथा के रूप में नहीं देखा जा सकता।
पीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कहीं न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कानून बनाने का कार्य न करने लगे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालय न तो कानून बना सकता है और न ही संशोधन कर सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि किसी मौजूदा कानून को हटाने की कसौटी बहुत ऊंची होती है।
इस दौरान यह भी चर्चा हुई कि यदि विवादित प्रावधानों को निरस्त किया जाता है तो क्या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम को लागू किया जा सकता है, जो लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता। हालांकि इस पर न्यायालय ने सावधानी बरतने की बात कही।
देखा जाये तो समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे निजी मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो। वर्तमान में अलग अलग धर्मों और समुदायों के लिए अलग अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जो मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों पर आधारित हैं।
यह मुद्दा लंबे समय से देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था में चर्चा का विषय रहा है। वर्ष 2025 में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बना। इसके अलावा गुजरात विधानसभा ने भी इसी प्रकार का विधेयक पारित किया है, जबकि गोवा में पुर्तगाली नागरिक संहिता के तहत पहले से ही समान कानून लागू है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही है। उन्होंने इसे तुष्टीकरण की राजनीति समाप्त करने का उपाय बताया है। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी घोषणा की कि यदि राज्य में उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आती है तो छह महीने के भीतर इसे लागू किया जाएगा। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने भी समान नागरिक संहिता के संबंध में एक समिति के गठन की घोषणा की है।
बहरहाल, यह मामला न केवल महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह संविधान, धर्म और कानून के बीच संतुलन की जटिल बहस को भी सामने लाता है। आने वाले समय में न्यायालय की सुनवाई और राजनीतिक निर्णय इस विषय की दिशा तय करेंगे।