आयात समता मूल्य निर्धारण से प्राथमिक एल्युमीनियम की कीमतों में बढ़ोतरी होने से इस धातु पर निर्भर घरेलू ‘डाउनस्ट्रीम’ उद्योगों की लागत बढ़ रही है, जिससे उनका लाभ मार्जिन घट रहा है और विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो रही है। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। लोक नीति शोध संस्थान पॉलिसी कंसेंसस सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, सालाना 41.6 लाख टन से अधिक स्थापित क्षमता के साथ भारत प्राथमिक एल्युमीनियम का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
इसके बावजूद देश की लगभग 3,500 एल्युमीनियम इकाइयों, जिनमें बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) शामिल हैं, को कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट कहती है कि ये इकाइयां एल्युमीनियम मूल्य श्रृंखला में लगभग 90 प्रतिशत रोजगार उपलब्ध कराती हैं और बिजली पारेषण, नवीकरणीय ऊर्जा, रेलवे, इलेक्ट्रिक वाहन, निर्माण एवं इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए अहम उत्पाद तैयार करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एमएसएमई के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक प्राथमिक एल्युमीनियम पर 7.5 प्रतिशत मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) और उस पर लागू सामाजिक कल्याण अधिभार है।
घरेलू उत्पादक आयात समता मूल्य निर्धारण के आधार पर कीमत तय करते हैं, जिसमें सीमा शुल्क को भी शामिल कर लिया जाता है। इससे घरेलू खरीदारों को भी आयात के बराबर कीमत चुकानी पड़ती है। इस व्यवस्था के कारण कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है, जिससे पहले से सीमित परिचालन मार्जिन और कम हो जाता है तथा मूल्य संवर्धित विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ती है।
रिपोर्ट में शुल्क ढांचे में असंतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इसके तहत प्राथमिक एल्युमीनियम पर शुल्क कई तैयार उत्पादों की तुलना में अधिक है, जबकि आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों के चलते कई तैयार एल्युमीनियम उत्पाद रियायती या शून्य शुल्क पर भारत में आयात हो रहे हैं, जिससे घरेलू एमएसएमई पर प्रतिस्पर्धी दबाव बढ़ रहा है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्राथमिक एल्युमीनियम पर मूल सीमा शुल्क को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाए और उत्पादकों के लिए ऊर्जा लागत की भरपाई के उपाय किए जाएं, ताकि संतुलन बना रहे।
इसके अलावा, उत्पाद की उत्पत्ति के नियमों को सख्त करने, आवश्यक होने पर शुल्क-दर कोटा लागू करने, मुक्त व्यापार समझौतों के तहत सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करने तथा अनुचित मूल्य पर होने वाले आयात के खिलाफ लक्षित व्यापारिक उपाय अपनाने की भी सिफारिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, शुल्क का युक्तिसंगत निर्धारण डाउनस्ट्रीम एमएसएमई की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने, मूल्य संवर्धन बढ़ाने और रोजगार सृजन के साथ ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूती देने में मददगार होगा।
