ईरान की सत्ता व्यवस्था इन दिनों गंभीर आंतरिक खींचतान से गुजर रही है, जहां राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में विदेश मंत्री अब्बास अराघची हैं, जिन पर राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ का भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। दोनों शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें पद से हटाने की संभावना जताई जा रही है, जिससे देश के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति और संसद अध्यक्ष का मानना है कि अराघची ने हाल के सप्ताहों में सरकार की नीतियों को लागू करने वाले मंत्री की बजाय इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर अहमद वाहिदी के सहयोगी की तरह काम किया है। आरोप है कि उन्होंने संवेदनशील परमाणु वार्ताओं के दौरान वाहिदी के निर्देशों का पालन किया और राष्ट्रपति को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं दी। इससे कार्यपालिका के भीतर असंतोष बढ़ा है और राष्ट्रपति ने अपने करीबी सहयोगियों को संकेत दिया है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो वह कड़ा कदम उठा सकते हैं।
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यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान पहले से ही राजनीतिक और सैन्य संस्थानों के बीच गहरे मतभेदों से जूझ रहा है। जारी संघर्ष और उसके आर्थिक प्रभावों ने इन मतभेदों को और तीखा कर दिया है। पहले की रिपोर्टों में भी यह सामने आया था कि राष्ट्रपति पेजेशकियन और कमांडर अहमद वाहिदी के बीच युद्ध प्रबंधन और उसके आर्थिक असर को लेकर गंभीर असहमति है। राष्ट्रपति का मानना है कि युद्ध के कारण आम लोगों की आजीविका और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा है, जबकि सैन्य नेतृत्व सुरक्षा प्राथमिकताओं को सर्वोपरि मानता है।
सूत्रों ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति खुद को एक तरह के राजनीतिक गतिरोध में फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें महत्वपूर्ण सरकारी नियुक्तियों पर भी पूरा अधिकार नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर, वाहिदी का तर्क है कि युद्धकालीन परिस्थितियों में संवेदनशील पदों का नियंत्रण सीधे रिवोल्यूशनरी गार्ड के हाथ में होना चाहिए। इस टकराव ने सरकार के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन आंतरिक मतभेदों का असर ईरान की विदेश नीति और विशेष रूप से अमेरिका के साथ चल रही वार्ताओं पर भी पड़ा है। जानकारी के मुताबिक, वार्ता टीम के भीतर मतभेदों के कारण अप्रैल के मध्य में बातचीत से पीछे हटना पड़ा। बताया जाता है कि अराघची ने वार्ता के दौरान कुछ मुद्दों पर लचीलापन दिखाया, जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों, विशेषकर हिज्बुल्लाह को मिलने वाली वित्तीय और सैन्य सहायता में कमी। इस रुख का वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों, जिनमें मोहम्मद बाघेर जुलघदर भी शामिल हैं, उन्होंने कड़ा विरोध किया।
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अमेरिका की ओर से भी इस स्थिति पर प्रतिक्रिया आई। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को लगा कि ईरानी टीम के पास अंतिम समझौता करने का अधिकार नहीं है और उन्हें तेहरान के उच्च नेतृत्व की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। इससे वार्ता प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे। साथ ही वार्ता टीम के नेतृत्व को लेकर भी असहमति सामने आई है। पहले दौर की बातचीत में ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, जिसमें इस्लामाबाद में हुई बैठकें भी शामिल थीं। हालांकि, कुछ कट्टरपंथी सांसदों ने टीम का खुलकर समर्थन नहीं किया, भले ही संसद में व्यापक समर्थन मौजूद था। बाद में परमाणु ऊर्जा से जुड़े मुद्दों को बातचीत में शामिल करने की कोशिश को लेकर गालिबाफ की आलोचना हुई, जिसके बाद उन्होंने पीछे हटने का निर्णय लिया।
इसके बाद अब्बास अराघची ने वार्ता में अधिक प्रमुख भूमिका निभाने की कोशिश की और 24 अप्रैल को इस्लामाबाद जाकर तेहरान का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। हालांकि, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया, जिससे कूटनीतिक प्रयासों को झटका लगा। हालांकि अराघची को हटाने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह के संकेत सामने आ रहे हैं, वे ईरान के नेतृत्व के भीतर गहराते संकट की ओर इशारा करते हैं। एक ओर आंतरिक सत्ता संघर्ष है, तो दूसरी ओर बाहरी दबाव और ठप पड़ी कूटनीति। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान अपनी राजनीतिक एकजुटता को कैसे बनाए रखता है और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को कैसे संभालता है।
