IIT खड़गपुर देश का पहला AI स्कूल खोलने जा रहा है। इसके लिए संस्थान ने अपने पूर्व छात्र विनोद गुप्ता और IIT खड़गपुर फाउंडेशन अमेरिका के साथ MoU साइन किया है। इसका मकसद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) रिसर्च, इंटरडिसिप्लिनरी एजुकेशन और AI टेक्निक के डेवलपमेंट को बढ़ावा देना है। AI स्कूल बनाने में 35 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। ऐसे मिलेगा 35 करोड़ का फंड 35 करोड़ के फंड में से 12.5 करोड़ का योगदान विनोद गुप्ता का परिवार देगा। विनोद गुप्ता भारतीय मूल के अमेरिकी उद्यमी हैं। उन्होंने अमेरिका में बिजनेस-डेटा कंपनी InfoUSA की स्थापना की। वे शिक्षा के क्षेत्र में दिए योगदान के लिए पहचाने जाते हैं। IIT खड़गपुर में उन्होंने पहले भी मैनेजमेंट एजुकेशन और रिसर्च इंस्टीट्यूशन की स्थापना में आर्थिक सहयोग दिया है। बेंजामिन गुप्ता के नाम पर रखा जाएगा नाम विनोद गुप्ता के अलावा 10 करोड़ रुपये का योगदान एक पूर्व छात्र की तरफ से दिया गया है। इस छात्र ने अपना नाम न बताने का फैसला किया है। इसके बाद बची हुई राशि IIT खड़गपुर की तरफ से दी जाएगी। इस स्कूल का नाम विनोद गुप्ता के दिवंगत बेटे बेंजामिन गुप्ता की याद में ‘बेंजामिन गुप्ता स्कूल ऑफ फिजिकल AI’ रखा जाएगा। बेंजामिन द जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में संयुक्त JD/MBA कोर्स कर रहे थे। वे अमेरिकी प्रतिनिधि रहम इमैनुएल और अमेरिकी विदेश विभाग से जुड़े हुए थे। उनका 28 वर्ष की उम्र में निधन हुआ था। फिजिकल AI पर आधारित भारत का पहला स्कूल IIT खड़गपुर के इस स्कूल को फिजिकल AI पर आधारित भारत के पहले एकेडमिक इंस्टीट्यूशन के रूप में पेश किया जाएगा। यह रियल वर्ल्ड के माहौल को समझने के साथ ही उसका पूर्वानुमान लगा सकता है। साथ ही उसे नियंत्रित कर सकता है। ये स्कूल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी को फिजिक्स, इंजीनियरिंग, बायोलॉजिकल सिस्टम और स्पेशलाइज्ड साइंटिफिक नॉलेज के साथ जोड़ने पर फोकस्ड रहेगा। इसके रिसर्च एरिया में फिजिक्स आधारित मशीन लर्निंग, साइंटिफिक AI, डिजिटल ट्विन्स, इंटेलिजेंट रोबोटिक्स, ऑटोनोमस सिस्टम्स, एडवांस्ड सेंसिंग कंप्यूटेशनल इंजीनियरिंग और AI इनेबल्ड एक्सपेरिमेंट शामिल हैं। IIT खड़गपुर के AI स्कूल में हाइब्रिड मोड में मास्टर डिग्री, प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन और प्रोफेशनल्स के लिए ट्रेनिंग शामिल हो सकती है। इसकी शुरुआत अगले सेशन से होने की संभवना है। IISER पुणे की पहल
IIT खड़गपुर की तरह देशभर के कई हाई एजुकेशन इंस्टीट्यूट AI को नए लेवल तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके तहत पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER Pune) ने स्टूडेंट्स और रिसर्चर्स के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर नई पॉलिसी अपनाई है। IISER पुणे में स्टूडेंट्स AI का उपयोग तब तक सामान्य रूप से कर सकते हैं, जब तक टीचर या PhD सुपरवाइजर लिखित रूप से इस पर रोक न लगाए। यह नीति मार्च 2026 में संस्थान की सीनेट से मंजूर हुई थी और अप्रैल में चर्चा में आई। यहां स्टूडेंट्स के लिए AI का यूज करना या न करना उनके कोर्स पर डिपेंड करेगा। फिलहाल IISER पुणे में ज्यादातर क्विज और मिड-सेमेस्टर व एंड-सेमेस्टर एग्जाम AI के बिना ही आयोजित किए जाते हैं। IIM अहमदाबाद ने अपनाया केस स्टडी तरीका IIM अहमदाबाद में AI की वजह से फैकल्टी सदस्य मैनेजमेंट एजुकेशन के केस-स्टडी तरीके को फिर से अपना रहे हैं। यहां छात्र क्लासरूम में जाने से पहले, लंबे बिजनेस केस की समरी तैयार करने और उनका एनालिसिस करने के लिए ChatGPT और Gemini जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि AI की मदद से तैयार किए गए सवालों के जवाब या समरी सभी स्टूडेंट्स के लिए एक जैसी होती है। जिससे उनके स्कोर प्रभावित हो सकते हैं। इस संस्थान ने स्टूडेंट्स, फैकल्टी मेंबर्स, रिसर्च एसोसिएट्स और अन्य के लिए 1500 AI टूल्स का लाइसेंस लिया है। IIM बैंगलोर में छात्रों ने बनाएं चैटबॉट IIM बैंगलोर ने स्टूडेंट्स के लिए AI के यूज को आगे बढ़ाते हुए छात्रों को परीक्षा में AI का उपयोग करने की अनुमति दी है। यहां इस साल जून-जुलाई सेशन के दौरान, कोर बिजनेस एनालिटिक्स और जनरल MBA इलेक्टिव समूहों के 78 MBA छात्रों ने जेनरेटिव AI से जुड़े मिडटर्म सवालों के जवाब देने के लिए खुद के चैटबॉट बनाए। द इंडियन स्कूल बिजनेस ऑफ हैदराबाद और मोहाली में फैकल्टी तय करती है कि स्टूडेंट्स को किस कोर्स, एसाइनमेंट्स, ग्रुप प्रोजेक्ट्स और रिसर्च में AI की परमिशन दी जाना चाहिए और किस कोर्स के लिए नहीं। सर्वे में सामने आए दोहरे नतीजे यूके में ‘हायर एजुकेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ (HEPI) के ‘स्टूडेंट जेनरेटिव AI सर्वे 2026’ के अनुसार AI से जुड़े स्टूडेंट्स के एक्सपीरियंस में बड़ा अंतर सामने आया है। कुछ छात्रों के लिए AI उनकी सोचने की क्षमता बढ़ाता है, वहीं कई स्टूडेंट्स के लिए यह एक ऐसे सहारे की तरह काम करता है जिसके बिना वे कोई प्रोजेक्ट या पढ़ाई ठीक तरह से नहीं कर पाते। इसलिए, उच्च शिक्षा संस्थानों को AI से संबंधित ऐसे नियम बनाना चाहिए जो स्टूडेंट्स के लिए सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाए। भारत के अलावा अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, चीन में AI स्कूल हैं। हालांकि ये पूरी तरह AI बेस्ड नहीं हैं बल्कि इन स्कूलों में AI की पढ़ाई टीचर द्वारा ही कराई जाती है।
————————————————————————- ये खबर भी पढ़ें IIT रोपड़ ने बिना थीसिस वाला PhD प्रोग्राम लॉन्च किया:अब अपना स्टार्टअप मॉडल दिखाकर सीधे ले सकेंगे डिग्री IIT रोपड़, पंजाब ने PhD स्टूडेंट्स के लिए एक मॉडल तैयार किया है। जिसमें स्टूडेंट्स को अब सालों तक लंबी थीसिस लिखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इसके बजाय एक अपने ही प्रोडक्ट को बेचकर, उसका प्राफिट इंस्टीट्यूट को दिखाकर डिग्री हासिल कर सकते हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें
IIT खड़गपुर में बनेगा देश का पहला AI स्कूल:35 करोड़ खर्च, IISER पुणे, IIM बैंगलोर ने जारी की नई पॉलिसी
सिद्धभूमि के लेखक एक प्रमुख समाचार लेखक हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी जानकारी और विश्लेषण प्रदान किया है। उनकी लेखनी न केवल तथ्यात्मक होती है, बल्कि समाज की जटिलताओं को समझने और उजागर करने की क्षमता रखती है। उनके लेखों में तात्कालिक घटनाओं के विस्तृत विश्लेषण और विचारशील दृष्टिकोण की झलक मिलती है, जो पाठकों को समाज के विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
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सिद्धभूमि -
एक ऐसे समय में जब प्रिंट एवं मुद्रण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था ,समाचार पत्र अपने संसाधनो के बूते निकाल पाना बेहद दुष्कर कार्य था ,लेकिन इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” ने 12 मार्च 1978 को पडरौना (कुशीनगर ) उत्तर प्रदेश से सिद्ध भूमि हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया | स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” सीमित साधनों व अभावों के बीच पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाले पत्रकार थे । उनका मानना था कि पत्रकारिता राष्ट्रीय लोक चेतना को उद्वीप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा ही जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखा जा सकता है । किसी भी संस्था के लिए चार दशक से अधिक का सफ़र कम नही है ,सिद्ध भूमि ने इस लम्बी यात्रा में जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखते हुए कर्मपथ पर अपने कदम बढ़ाएं हैं और भविष्य के लिए भी नयी आशाएं और उम्मीदें जगाई हैं । ऑनलाइन माध्यम की उपयोगिता को समझते हुए सिद्ध भूमि न्यूज़ पोर्टल की शुरुवात जुलाई 2013 में किया गया |
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