नयी दिल्ली, सात सितंबर पेइंग गेस्ट (पीजी) आवासों के लिए नयी सुरक्षा नीति लाने की दिल्ली सरकार की योजना भले ही सत्य निकेतन इमारत हादसे के बाद बनी हो, लेकिन शहर में पीजी के नियमन की कोशिशें तीन दशक से भी अधिक समय से जारी हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोमवार को कहा कि उनकी सरकार एक ऐसी नीति तैयार कर रही है, जिसके तहत पुरानी इमारतों के मालिकों को संबंधित परिसर का इस्तेमाल पीजी आवास, नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के रूप में करने के लिए उसकी (इमारत) संरचनात्मक ऑडिट रिपोर्ट जमा करनी होगी और सुरक्षा प्रमाणित करनी पड़ेगी। यह घोषणा दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के दक्षिण परिसर के पास स्थित सत्य निकेतन में वह इमारत ढहने की घटना की पृष्ठभूमि में आई है, जिसका इस्तेमाल पीजी के संचालन के लिए किया जा रहा था।
हालांकि, रिकॉर्ड बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी में पीजी आवासों को विनियमित करने की कोशिशें 1993 से जारी हैं, जिनके तहत बाद के वर्षों में पंजीकरण और लाइसेंस व्यवस्था लागू करने के लिए नयी योजनाएं, सर्वेक्षण, समितियां और प्रस्ताव सामने आते रहे। दिल्ली उच्च न्यायालय के साल 2006 के एक फैसले के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से तैयार की गई “पेइंग गेस्ट आवास योजना” वर्ष 1993 में ही राष्ट्रीय राजधानी में लागू कर दी गई थी। फैसले में कहा गया था, “देश-विदेश के पर्यटकों को रहने की साफ-सुथरी और किफायती जगह उपलब्ध कराने के मकसद से केंद्र सरकार ने एक योजना बनाई थी, जिसके तहत रिहायशी इमारतों का इस्तेमाल पर्यटकों को ठहराने और भोजन उपलब्ध कराने के लिए किया जा सकता था।”
इसमें कहा गया था, “योजना की एक शर्त यह थी कि इसका लाभ उठाने वाले व्यक्ति का आवास भी उसी इमारत में होना चाहिए।
योजना को ‘पेइंग गेस्ट आवास योजना’ नाम दिया गया था।”
फैसले में साउथ एक्सटेंशन पार्ट-1 की एक संपत्ति का जिक्र किया गया था, जिसे दिसंबर 1993 में इस योजना के तहत ‘पेइंग गेस्ट’ आवास के रूप में इस्तेमाल करने की मंजूरी दी गई थी। बाद में इस योजना के विनियमन की जिम्मेदारी कांग्रेस नेता शीला दीक्षित के नेतृत्व तत्कालीन दिल्ली सरकार को सौंप दी गई, जिसने साल 2000 में अपनी ‘पेइंग गेस्ट आवास योजना’ को स्वीकृति प्रदान की थी। इस योजना के तहत मकान मालिक ‘पेइंग गेस्ट’ रखने के लिए दिल्ली पर्यटन विभाग में पंजीकरण करा सकते थे।
‘पेइंग गेस्ट’ रखने के लिए मकान के कुल बेडरूम में से आधे से अधिक का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। यही नहीं, ‘पेइंग गेस्ट’ रखने के लिए अधिकतम चार कमरे या आठ बिस्तर के इस्तेमाल की सीमा तय की गई थी। हालांकि, यह योजना मुख्य रूप से पर्यटकों को ऐसे घरों में रहने की किफायती जगह उपलब्ध कराने के मकसद से बनाई गई थी, जिनमें मकान मालिक खुद रहते हैं।
इसमें ऐसे बड़े व्यावसायिक पीजी आवासों का जिक्र नहीं था, जो बाद में दिल्ली के विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास तेजी से खुले। पीजी व्यवसाय का स्वरूप और दायरा तो आगे बढ़ता गया और बदलता गया, लेकिन उसके विनियमन की कोशिशें उस रफ्तार से नहीं बढ़ पाईं। डीयू के आसपास रहने वाले छात्रों की समस्याओं का पता लगा रही दिल्ली विधानसभा की एक याचिका समिति लगभग दो दशक बाद भी, पीजी पर कौन से नियम लागू होते हैं और उनके क्रियान्वयन के लिए कौन जिम्मेदार है, जैसे बुनियादी सवाल पूछ रही है।
समिति ने अगस्त 2019 में आयोजित एक बैठक में अधिकारियों से डीयू के आसपास संचालित पीजी आवासों और अन्य प्रतिष्ठानों की सूची तैयार करने को कहा था। इससे भी अहम बात यह है कि समिति ने एक ऐसे दस्तावेज की मांग की, जिसमें पीजी आवासों को नियंत्रित करने वाले नियमों का स्पष्ट जिक्र हो और अग्नि सुरक्षा, भवन मानकों तथा स्वास्थ्य लाइसेंस के मामले में “विनियमन संबंधी समस्याओं/अस्पष्ट क्षेत्रों” की पहचान की गई हो। अधिकारियों को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया, “हालांकि, आज तक ऐसा कोई दस्तावेज हासिल नहीं हुआ है।”
इसके बाद सर्वेक्षण और विनियमन के कई और प्रयास किए गए। साल 2021 में तत्कालीन उत्तर दिल्ली नगर निगम ने पीजी आवासों, खास तौर पर डीयू के उत्तर परिसर के आसपास संचालित ऐसे प्रतिष्ठानों का सर्वेक्षण करने और व्यावसायिक परिसरों के रूप में इस्तेमाल की जा रही इमारतों का पंजीकरण करने का प्रस्ताव रखा था। साल 2022 में दिल्ली सरकार के गृह विभाग, शहर की पुलिस और नगर निकायों के बीच हुई बैठकों के बाद अधिकारियों ने कॉलेज के छात्रों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले लगभग 700 निजी छात्रावासों और पीजी आवासों को दिल्ली पुलिस की लाइसेंस व्यवस्था के दायरे में लाने का प्रस्ताव रखा था।
अधिकारियों ने तब माना था कि ऐसी जगहों को विनियमित करने के लिए कोई वैधानिक संस्था मौजूद नहीं है। प्रस्तावित नियमों में रहने वालों की संख्या, रसोई, लिफ्ट, अग्नि सुरक्षा मंजूरी और अन्य सुविधाओं को शामिल किया जाना था। इसके बावजूद एक साल बाद विनियमन से जुड़ी खामियां फिर से सामने आईं।
सितंबर 2023 में मुखर्जी नगर में एक महिला पीजी आवास में आग लगने की घटना के बाद दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने फिर से सर्वेक्षण का आदेश दिया। नगर निकाय के अधिकारियों ने कहा कि आवासीय क्षेत्र में पीजी आवास संचालित करने के लिए कोई विशेष नियम निर्धारित नहीं हैं और निगम पीजी आवास के लिए लाइसेंस जारी नहीं करता है, हालांकि भवन निर्माण, भूमि उपयोग और अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियम लागू होते हैं। इसके बाद सर्वेक्षण में 100 से अधिक ऐसे पीजी आवासों की पहचान की गई, जो भवन उपनियमों का कथित तौर पर उल्लंघन कर संचालित किए जा रहे थे।
पहली योजना के लगभग तीन दशक बाद सत्य निकेतन की घटना ने पीजी आवासों के विनियमन से जुड़े मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है और दिल्ली सरकार एक नयी नीति लाने की तैयारियों में जुट गई है।
