माला क्या होती है? सीधा और सरल जवाब है- एक अलंकारिक वस्तु, जो फूलों से या अन्य चीजों मसलन पत्ती, कागज आदि से बनायी जाती है। यूं तो मालाएं कई प्रकार की होती हैं; जैसे फूलों की, रत्नों की, बीजों की एवं धातुओं की आदि। लेकिन मोतियों की माला का एक पौधा होते हैं, जिसे अंग्रेजी में स्ट्रिंग ऑफ प्लर्स कहते हैं जो अपने नाम के अनुरूप लगभग गोलाकार, छोटे मटर के आकार के पत्तों द्वारा आसानी से पहचाने जा सकते हैं। पत्तियों के तने पर उगते हैं, जो सुंदर ढंग से प्लांटर्स और हैंगिंग बास्केट के ऊपर फैल जाते हैं। लेकिन आज हम बात स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नामक पौधे की नहीं बल्कि चीन की एक नीति, एक योजना की करेंगे। चीन की इस योजना को मोतियों की माला, स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है। आपको ये लगता होगा कि चीन हमेशा अपनी सीमा से आगे बढ़कर बॉर्डर वाले इलाकों के जरिये भारत में कब्जा जमाना जमाना चाहता है। लेकिन ये अकेला ऐसा इलाका नहीं है जहां से चीन भारत को घेरने की कोशिश करता है।
आखिर क्या है स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स
दक्षिणी छोर पर हिन्द महासागर के जरिए चीन भारत को घेरना चाहता है। भारत को घेरने की कोशिश में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों का इस्तेमाल कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हंबनटोटा, बांग्लादेश के चिटगोंग पोर्ट, म्यांमार का क्यौकप्यू पोर्ट, मालदीव के फेयधूफिनोल्हु द्वीप को चीन ने अपना बेस बनाया। भारत को घेरने की इस नीति को चीन स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का नाम देता है। चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति उसकी उसी सिल्क रूट का हिस्सा है जिसे वो बेल्ट एंड रोड एनिसिएटिव का नाम देता है। कंबोडिया से शुरू होकर म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान से होते हुए ये रास्ता सुडान तक जाता है। अगर आप इस रास्ते को जोड़ते हैं तो ये साफ तौर पर भारत को घेरता हुआ दिखाई पड़ता है। भारत को घेरने की रणनीति के तहत ही चीन इन देशों के पोर्ट और द्वीप पर अपने बेस बना रहा है।
कब दुनिया के सामने खुली चीन की पोल
‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का जिक्र आज से करीब 16 साल पहले (2005 में) अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय ने ‘एशिया में ऊर्जा का भविष्य’ नाम की एक खुफिया रिपोर्ट में किया था। पेंटागन की इस रिपोर्ट में चीन द्वारा समुद्र में तैयार किए जा रहे ‘मोतियों’ का विस्तृत विवरण दिया गया था। ये समुद्र में पाए जाने वाले मोती नहीं बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का-स्ट्रैट, बंगाल की खाड़ी और अरब की खाड़ी तक (यानि पूरे हिंद महासागर में) सामरिक ठिकाने (बंदरगाह, हवाई पट्टी, निगरानी-तंत्र इत्यादि) तैयार करना था। हालांकि उस वक्त इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ये ठिकाने अपने ऊर्जा-स्रोत और तेल से भरे जहाजों के समुद्र में आवागमन की सुरक्षा के लिए तैयार कर रहा है। लेकिन जरुरत पड़ने पर इन सामरिक-ठिकानों को सैन्य-जरुरतों के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है।
मालदीव
चीन पर भरोसा करना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसकी ये योजना जिबूती तक ही सीमित नहीं है। मालदीव में अब्दुल्ला यामीन की चीन समर्थित सरकार थी। लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा था। उनके कार्यकाल के दौरान मालदीव के फेयधूफिनोल्हु द्वीप में उसने अपना मिलिट्री बेस बना लिया है। 2066 तक के लिए मालदीव की सरकार से चीन ने इस द्वीप को 4 मिलियन डॉलर की लीज पर लिया हुआ है। चीन के अधिकार में आने के बाद से इस द्वीप के आकार में 38 हजार स्क्वायर मीटर से एक लाख स्क्वायर मीटर की बढ़ोतरी हुई है। चीन ने कहा है कि ये उसका अधिकार है कि वो इस द्वीप का कैसे प्रयोग करता है। अगर चीन का ये मिलिट्री बेस पूरी तरह से काम करने लगता है तो हिन्द महासागर में इस मिलिट्री बेस की दूरी लक्ष्यद्वीप से केवल 900 और भारत की मुख्य भूमि से 1 हजार किलोमीटर की दूरी पर होगा।
म्यांमार
म्यांमार के क्याकप्यू बंदरगाह में चीन की मौजूदगी है। बंगाल की खाड़ी में स्थित बंदरगाह ने चीन को एक वाणिज्यिक समुद्री सुविधा प्रदान की है जिसका उपयोग संघर्ष के समय एक सैन्य सुविधा के रूप में किया जा सकता है। चीन ने यहां काफी निवेश किया है और क्यायुकु और कुनमिंग को जोड़ती 2400 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन इसका एक उदाहरण है। भारतीय तटों के निकट एक अन्य चीनी उपस्थिति कोको द्वीप समूह में है। कोको द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उत्तर में स्थित हैं और संघर्ष के समय रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चीन के पास कथित तौर पर वहां एक सैन्य अड्डा भी है।
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सिद्धभूमि के लेखक एक प्रमुख समाचार लेखक हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी जानकारी और विश्लेषण प्रदान किया है। उनकी लेखनी न केवल तथ्यात्मक होती है, बल्कि समाज की जटिलताओं को समझने और उजागर करने की क्षमता रखती है। उनके लेखों में तात्कालिक घटनाओं के विस्तृत विश्लेषण और विचारशील दृष्टिकोण की झलक मिलती है, जो पाठकों को समाज के विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
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सिद्धभूमि -
एक ऐसे समय में जब प्रिंट एवं मुद्रण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था ,समाचार पत्र अपने संसाधनो के बूते निकाल पाना बेहद दुष्कर कार्य था ,लेकिन इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” ने 12 मार्च 1978 को पडरौना (कुशीनगर ) उत्तर प्रदेश से सिद्ध भूमि हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया | स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” सीमित साधनों व अभावों के बीच पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाले पत्रकार थे । उनका मानना था कि पत्रकारिता राष्ट्रीय लोक चेतना को उद्वीप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा ही जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखा जा सकता है । किसी भी संस्था के लिए चार दशक से अधिक का सफ़र कम नही है ,सिद्ध भूमि ने इस लम्बी यात्रा में जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखते हुए कर्मपथ पर अपने कदम बढ़ाएं हैं और भविष्य के लिए भी नयी आशाएं और उम्मीदें जगाई हैं । ऑनलाइन माध्यम की उपयोगिता को समझते हुए सिद्ध भूमि न्यूज़ पोर्टल की शुरुवात जुलाई 2013 में किया गया |
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