इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा में इस साल अप्रैल में कामगारों के विरोध प्रदर्शन को लेकर दर्ज दो प्राथमिकियों के संबंध में कर्मचारी यूनियन ‘‘मजदूर बिगुल दस्ता’’ के सदस्य हिमांशु ठाकुर को जमानत दे दी। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना और न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने अलग-अलग इन मामलों में आदेश जारी किया। अदालत ने पाया कि भीड़ की कथित हिंसा में ठाकुर की कोई स्पष्ट या विशेष भूमिका नहीं थी।
गौतम बुद्ध नगर के फेज-2 थाने में दर्ज इन दोनों मामलों में हिमांशु ठाकुर को 17 अप्रैल, 2026 को गिरफ्तार किया गया था। प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि कामगारों की बड़ी संख्या में भीड़ नोएडा के औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर एकत्र हुई और प्रदर्शनकारियों ने पथराव कर कंपनी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया तथा कर्मचारियों एवं पुलिसकर्मियों पर हमला किया। इस मामले में ठाकुर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम और आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने अपराध संख्या 164 में जमानत देते हुए कहा कि समान अधिकार क्षेत्र वाली एक पीठ पहले ही सह-आरोपी रवि कुमार राठौर को जमानत दे चुकी है। न्यायमूर्ति पहल ने सात अगस्त को जमानत देते हुए कहा कि ठाकुर का आपराधिक इतिहास सामने नहीं आया है। अदालत ने उन्हें एक निजी मुचलका और दो जमानतदार पेश करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।
इसके करीब दो सप्ताह बाद 20 अगस्त को न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने अपराध संख्या 165 में ठाकुर को जमानत प्रदान की। राज्य सरकार के वकील ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि ठाकुर की सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे राज्य में हिंसा फैलाने में भूमिका थी। हालांकि, अदालत ने कहा कि 400-500 लोगों की भीड़ में ठाकुर की कोई विशेष भूमिका सामने नहीं आई है।
ठाकुर के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के पास से कोई हथियार, विस्फोटक या आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री बरामद नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि न तो प्राथमिकी में और न ही गवाहों के बयानों में यह उल्लेख है कि ठाकुर पथराव, गेट तोड़ने या वाहनों में आग लगाने की घटनाओं के दौरान मौके पर मौजूद थे।
