पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा, जिस पर लंबे समय से बाहरी होने का आरोप लगता रहा, उसने इस धारणा को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह पार्टी के नेता स्थानीय खानपान, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ते नजर आए हैं, उससे बंगाल के लोगों के बीच यह संदेश गया है कि यह दल अब बाहरी नहीं, बल्कि अपना ही है। स्थानीय भोजन के साथ जुड़ाव ने इस राजनीतिक दूरी को कम करने में अहम भूमिका निभाई है और मतदाताओं के मन में अपनापन पैदा किया है।
हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में इस बार राजनीति और भोजन का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। यह केवल प्रचार का तरीका नहीं, बल्कि पहचान, सांस्कृतिक जुड़ाव और स्वीकार्यता का प्रतीक बन गया है। जिस तरह फिल्मकार सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों में काशी को बंगालियों के दूसरे घर के रूप में दिखाया था, ठीक उसी तरह अब राजनीतिक दल बंगाल के लिए अपनापन दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में स्थानीय खानपान को एक प्रमुख माध्यम बनाया गया है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झारग्राम में झालमुरी खाना हो या अन्य नेताओं का मछली के साथ प्रचार करना, यह सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। लंबे समय से बंगाल में बाहरी होने के आरोप से जूझ रही भाजपा का स्थानीय भोजन को अपनाना एक संकेत है कि वह खुद को बंगाल की संस्कृति के करीब दिखाना चाहते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान खासतौर पर भोजन केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि पहचान और जुड़ाव का माध्यम बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में बाहरी का अर्थ केवल भौगोलिक नहीं है, बल्कि यह भाषा, व्यवहार और खानपान से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने इस बाहरी मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया था। इसी के बाद अब भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रही है।
हम आपको बता दें कि चुनाव प्रचार में भाजपा के कई नेता जैसे अनुराग ठाकुर मछली खाते हुए नजर आए, वहीं कुछ उम्मीदवार मछली हाथ में लेकर प्रचार करते दिखे। विशेषज्ञों के अनुसार, मोदी का झालमुरी खाना एक सुरक्षित और संतुलित विकल्प था। चूंकि वह शाकाहारी हैं, इसलिए उनके लिए मछली खाना संभव नहीं था। हम आपको बता दें कि बंगाल का खानपान अपने आप में विविधता से भरा है। इसमें इस्लामी, डच और अंग्रेजी प्रभाव भी देखने को मिलता है। साथ ही घोटी और बंगाल समुदायों के बीच भी भोजन को लेकर अलग अलग परंपराएं हैं। ऐसे में झालमुरी एक ऐसा विकल्प है जो हर वर्ग में समान रूप से स्वीकार्य है। यह सस्ता, सरल और सर्वव्यापी है, इसलिए राजनीतिक रूप से भी सुरक्षित माना जाता है।
इसके अलावा, चुनावी माहौल में केवल नेता ही नहीं, बल्कि मीडिया भी इस भोजन राजनीति का हिस्सा बन गया है। विभिन्न समाचार चैनल और पत्रकार चुनाव कवरेज के दौरान स्थानीय भोजन को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। कहीं किसी होटल से चर्चा हो रही है तो कहीं सड़कों पर खाने के दृश्य दिखाए जा रहे हैं। इस तरह भोजन अब एक समाचार विषय भी बन गया है। वैसे जब कोई नेता स्थानीय भोजन खाता है तो वह यह संदेश देना चाहता है कि वह उस जगह का हिस्सा है। लेकिन जब यह सब कैमरे के सामने किया जाता है, तो यह कृत्रिम भी लग सकता है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में भोजन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण बन गया है। लेकिन यह बात भी सही है कि जब चुनावी मुद्दे रोजगार, विकास और प्रवासन से हटकर केवल खानपान पर केंद्रित हो जाते हैं, तो असली समस्याएं पीछे छूटने का खतरा पैदा हो जाता है। वैसे इस बार चुनावी मुकाबले में भोजन केवल प्रतीक नहीं, बल्कि प्रभावी राजनीतिक संदेश बनकर उभरा है। जिस तरह भाजपा ने स्थानीय स्वाद और संस्कृति के जरिए अपनी छवि को बदला है, उससे यह संकेत मिल रहा है कि रणनीति असर दिखा रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस चुनाव में झालमुरी और मछली केवल खानपान की चीजें नहीं रहीं, बल्कि वह ऐसे प्रतीक बन गई हैं जो भाजपा की नैया पार लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
