दक्षिण एशिया की राजनीति में अचानक आया यह मोड़ किसी भूचाल से कम नहीं है। कुछ महीने पहले तक भारत को घेरने की साजिश रचने वाले पड़ोसी देश आज उसी भारत के दरवाजे पर खड़े हैं। ईरान युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरे क्षेत्र की असलियत उजागर कर दी है। जो देश कभी “इंडिया आउट” का नारा लगा रहे थे, आज वही भारत से तेल और गैस की मदद मांग रहे हैं। यह सिर्फ कूटनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का निर्णायक पल है।
सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कच्चे तेल का लगभग नब्बे प्रतिशत हिस्सा एशिया के देशों के लिए होता है। ईरान युद्ध ने इस जीवनरेखा को झकझोर दिया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देश ऊर्जा निर्भरता के दलदल में फंस गए हैं। भारत भी आयात पर निर्भर है, लेकिन उसकी रणनीतिक तैयारी और संतुलित कूटनीति ने उसे संकट में भी मजबूत बनाए रखा है। ईरान ने भारत को मित्र मानते हुए तेल और रसोई गैस के जहाजों को रास्ता दिया, जो भारत के लिए बड़ी राहत साबित हुआ।
लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है। भारत ने सिर्फ अपनी जरूरतों की चिंता नहीं की, बल्कि अपने पड़ोसियों को संकट से निकालने का बीड़ा उठाया। यही है भारत की “पड़ोस पहले” नीति का असली चेहरा, जो केवल नारा नहीं बल्कि जमीनी हकीकत बन चुकी है।
हम आपको बता दें कि युद्ध से उपजे संकट का बांग्लादेश सबसे बड़ा शिकार बना है। अपनी जरूरत का 95 प्रतिशत तेल और तीस प्रतिशत गैस आयात करने वाला यह देश अब अंधेरे में डूब रहा है। बिजली कटौती, उद्योगों का ठप होना और विश्वविद्यालयों का बंद होना इस बात का सबूत है कि ऊर्जा संकट किसी देश की रीढ़ कैसे तोड़ सकता है। कपड़ा उद्योग, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की जान है, इस समय डीजल की कमी से जूझ रहा है।
ऐसे में बांग्लादेश सरकार ने भारत की ओर रुख किया और भारत ने बिना देरी किए मदद का हाथ बढ़ाया। असम के नुमालीगढ़ रिफाइनरी से पाइपलाइन के जरिए डीजल की आपूर्ति तेज कर दी गई। हजारों टन ईंधन भेजा गया और आगे भी आपूर्ति जारी है। हम आपको याद दिला दें कि यह वही बांग्लादेश है जहां हाल ही में भारत विरोधी माहौल चरम पर था और पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ रही थीं। लेकिन संकट ने उसे सच्चाई दिखा दी कि असली सहारा कौन है।
मालदीव का मामला और भी दिलचस्प है। एक साल पहले तक भारत के खिलाफ सबसे ज्यादा जहरीली भाषा बोलने वाले इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु आज भारत को “विश्वसनीय साथी” बता रहे हैं। हम आपको याद दिला दें कि राष्ट्रपति मुइज्जु ने सत्ता में आते ही भारतीय सैनिकों को देश से बाहर कर दिया था और चीन की तरफ झुकाव दिखाया था। लेकिन जैसे ही ऊर्जा संकट और पर्यटन पर असर पड़ा, पूरी अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। अब पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन के लिए मालदीव को वही भारत याद आ रहा है।
श्रीलंका की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। 2022 के आर्थिक पतन की यादें अभी ताजा हैं। उस समय चीन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने की कीमत उसे भारी पड़ी थी। अब फिर वही स्थिति बन रही है। ऊर्जा जरूरत का साठ प्रतिशत आयात करने वाला श्रीलंका एक महीने से ज्यादा का भंडारण भी नहीं रख पाता। उसे ईंधन के दाम तैंतीस प्रतिशत तक बढ़ाने पड़े हैं। ऐसे समय में भारत ने एक बार फिर “पहला सहायक” बनकर दिखाया। हजारों टन पेट्रोल और डीजल तुरंत भेजा गया। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से भारत का आभार जताया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत है कि संकट के समय कौन साथ खड़ा होता है।
दक्षिण एशिया के इस बदलते परिदृश्य में नेपाल का जिक्र भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि यह वह पड़ोसी है जहां भारत की मदद लगातार और बिना किसी शोर के पहुंच रही है। ऊर्जा संकट के इस दौर में भारत ने नेपाल को ईंधन और आवश्यक आपूर्ति की निर्बाध आपूर्ति जारी रखी है। दरअसल, हिमालयी भूगोल और सीमित संसाधनों के कारण नेपाल पूरी तरह बाहरी आपूर्ति पर निर्भर है और ऐसे समय में भारत की स्थिर सप्लाई लाइन उसके लिए जीवनरेखा बनी हुई है। यह संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि भरोसे और पारस्परिक सहयोग का प्रतीक है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने पड़ोसियों को संकट में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा, चाहे हालात कितने भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।
देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद गहरा है। भारत ने यह साबित कर दिया है कि दक्षिण एशिया की ऊर्जा सुरक्षा की धुरी वही है। साथ ही यह इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को सीधी चुनौती है। जिन देशों ने चीन के भरोसे अपनी नीतियां बनाई थीं, वह अब भारत की ओर लौट रहे हैं। इसके अलावा, भारत ने मानवीय सहायता को रणनीतिक हथियार में बदल दिया है।
रणनीतिक रूप से देखें तो यह भारत के लिए सुनहरा मौका है। ऊर्जा आपूर्ति के जरिए भारत न केवल अपने पड़ोसियों को स्थिर कर रहा है, बल्कि उनके भीतर अपनी विश्वसनीयता भी मजबूत कर रहा है। यह भविष्य में सुरक्षा, व्यापार और राजनीतिक सहयोग के नए रास्ते खोलेगा।
बहरहाल, यह साफ है कि भाषण और नारे अपनी जगह हैं, लेकिन भूगोल और जरूरतें अपनी जगह। संकट के समय वही देश मायने रखता है जो मदद कर सके। और इस परीक्षा में भारत न केवल पास हुआ है, बल्कि पूरे क्षेत्र का केंद्र बनकर उभरा है। यही नया दक्षिण एशिया है, जहां भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि जीवनरेखा बन चुका है। खासतौर पर इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अगर किसी एक नेतृत्व की छाप सबसे स्पष्ट दिखती है, तो वह है प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति। उन्होंने भावनाओं से ऊपर उठकर रणनीति और दूरदर्शिता के साथ फैसले लिए हैं। जहां एक तरफ पड़ोसी देश कभी भारत विरोधी एजेंडा चला रहे थे, वहीं आज वही देश भारत को सबसे भरोसेमंद साथी मान रहे हैं। यह बदलाव अपने आप नहीं आया, बल्कि लगातार संवाद, सहायता और मजबूत नेतृत्व का परिणाम है। मोदी की नीति ने यह साबित कर दिया है कि सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन ही असली कूटनीति है। आज भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि संकट में भरोसे का दूसरा नाम बन चुका है और यह उपलब्धि सीधे तौर पर मोदी की रणनीतिक सोच और निर्णायक नेतृत्व का नतीजा है।
– नीरज कुमार दुबे