राज्यसभा सदस्य उज्ज्वल निकम ने बृहस्पतिवार को कहा कि युवा पीढ़ी को कानून के दायरे में रहकर अपनी मांगें रखनी चाहिए और असामाजिक तत्वों या किसी राजनीतिक पार्टी को अपने आंदोलनों का गलत फायदा उठाने का मौका नहीं देना चाहिए। देश में जारी युवा आंदोलनों के बारे में पूछे जाने पर निकम ने इंदौर में संवाददाताओं से कहा कि वह नौजवानों से अपील करना चाहेंगे कि वे अपनी सभी मांगें कानून के दायरे में रहकर रखें। उन्होंने युवा आंदोलनकारियों को ‘अराजकता’ की राह पर बढ़ने के खतरे के प्रति आगाह किया और कहा, ‘‘आपके आंदोलन का फायदा कुछ गुंडे उठा सकते हैं और कोई सियासी दल आंदोलन का गलत इस्तेमाल कर सकता है।
इस स्थिति से आपको बचना चाहिए।’’
निकम ने युवा आंदोलनकारियों को यह सलाह भी दी कि वे नियम-कानूनों के खिलाफ जाकर किसी भी व्यक्ति को उसके पद से फौरन हटाने की मांग न करें। उन्होंने कहा, ‘‘अगर आप (युवा आंदोलनकारी) अपने आंदोलन के जरिये चाहते हैं कि फलां व्यक्ति को पद से फौरन हटा दिया जाए, तो मुझे लगता है कि कल को कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की मांग कर सकता है और उससे देश की कानून-व्यवस्था और संविधान नष्ट हो जाएगा।’’
देश की संवैधानिक संस्थाओं को लेकर विपक्ष के लगातार सवाल खड़े किए जाने पर राज्यसभा सदस्य ने कहा कि अगर किसी भी व्यक्ति को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में कोई संदेह है, तो ऐसे मसलों के हल के लिए न्यायिक व्यवस्था है। निकम ने कहा कि न्यायाधीशों को भी मुकदमों की सुनवाई के दौरान ऐसी अतिरिक्त मौखिक टिप्पणियों से बचना चाहिए जो अदालती फैसलों में शामिल नहीं की जातीं क्योंकि कई बार इनका अलग-अलग अर्थ निकाला जाता है।
उन्होंने कहा कि आम लोगों को देश की न्यायिक व्यवस्था पर पूरा विश्वास है और यह भरोसा बरकरार रखने की जिम्मेदारी खुद न्यायिक व्यवस्था की भी है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने एक सवाल पर कहा कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध रोकने के लिए देश में पहले से कठोर कानून हैं, लेकिन इन पर जल्द से जल्द अमल होना चाहिए। मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को विशेष अदालत के आदेश पर फांसी की सजा दी गई थी।
इस मुकदमे में निकम ने सरकार की ओर से विशेष लोक अभियोजक के रूप में पैरवी की थी। उन्होंने किसी भी मुकदमे का विशिष्ट उल्लेख किए बगैर कहा, ‘‘मैंने ऐसे कई मुकदमों में पैरवी की जिनमें सत्र न्यायालय ने दोषी को फांसी की सजा सुनाई, लेकिन इसके बाद सजा पर अमल के लिए 10-10 साल लग रहे हैं। यह बहुत चिंताजनक बात है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह नहीं बोलूंगा कि अदालत द्वारा किसी दोषी को सुनाई गई मौत की सजा जल्द से जल्द दी जानी चाहिए, लेकिन ऐसे दोषियों की ओर से राष्ट्रपति के सामने पेश की जाने वाली दया याचिकाओं का निपटारा किए जाने के लिए समयसीमा तय की जानी चाहिए ताकि लोगों का विश्वास कानून-व्यवस्था पर बरकरार रह सके।’’
मीडिया के साथ बातचीत से पहले, निकम अपनी पत्नी ज्योति के साथ इंदौर की सामाजिक संस्था ‘सार्थक’ के कार्यक्रम में शामिल हुए।
इस दौरान उन्होंने अपने चर्चित मुकदमों और पारिवारिक जीवन के साथ ही आगामी फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ के बारे में बात की। निकम ने बताया कि इस फिल्म की कहानी बड़ी आतंकी घटनाओं से जुड़े उन ऐतिहासिक मुकदमों के आस-पास घूमती है जिनमें उन्होंने विशेष लोक अभियोजक के रूप में पैरवी करते हुए दोषियों को सजा दिलाई थी।
