भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए जून का महीना बॉन्ड बाजार से धन जुटाने के लिहाज से काफी बेहतर रहा। सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में गिरावट, उधारी लागत में कमी और बाजार में सकारात्मक धारणा के चलते जून में कॉरपोरेट बॉन्ड के जरिए जुटाई गई राशि में सालाना आधार पर 28 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है।
प्राइम डेटाबेस की ओर से जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने जून महीने में कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करके कुल 1.33 लाख करोड़ रुपये जुटाए हैं। यह आंकड़ा पिछले साल के इसी महीने में जुटाए गए 1.04 लाख करोड़ रुपये और इस साल मई में जुटाए गए 93,675 करोड़ रुपये से काफी अधिक है।
रॉकफोर्ट एलएलपी के प्रबंध साझेदार वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने बाजार की इस स्थिति पर बात करते हुए कहा कि अप्रैल और मई के सुस्त महीनों के बाद जून में बाजार की परिस्थितियां अनुकूल हुईं, जिससे कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने की रफ्तार बढ़ी। उन्होंने बताया कि इसका मुख्य कारण बेंचमार्क सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में आई बड़ी गिरावट रही, जिसने कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में कंपनियों की उधारी लागत को काफी कम कर दिया।
वहीं, चॉइस वेल्थ के उपाध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें घटकर 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गईं। इससे महंगाई और राजकोषीय घाटे को लेकर चिंताएं कम हुईं, जिससे बॉन्ड निर्गमों में तेजी देखने को मिली।
गौरतलब है कि इससे पहले अप्रैल और मई के दौरान ऊंचे प्रतिफल, वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव की वजह से ज्यादातर कंपनियों ने अपनी उधारी योजनाओं को टाल दिया था। लेकिन जून में जैसे ही अनिश्चितता के बादल छंटे, कंपनियों ने कम ब्याज दरों का लाभ उठाते हुए बॉन्ड बाजार का रुख किया।
श्रीनिवासन ने इस तेजी के पीछे कुछ अन्य कारकों को भी जिम्मेदार बताया। इनमें सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का मजबूत निवेश, भारत के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड सूचकांक में शामिल होने की संभावनाएं, मानसून की अच्छी प्रगति और ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर जल्दबाजी न करने संबंधी टिप्पणियां शामिल हैं। रिजर्व बैंक के हालिया कदमों और मजबूत घरेलू मांग ने भी इस तेजी को सहारा दिया।
भविष्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो विशेषज्ञों का मानना है कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही तक प्राथमिक बाजार की गतिविधियां मजबूत बनी रह सकती हैं। हालांकि, आने वाले समय में पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल के दाम, वैश्विक महंगाई, अमेरिकी मौद्रिक नीति और विदेशी निवेश का प्रवाह घरेलू बॉन्ड प्रतिफल और निर्गम गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
