उत्तर प्रदेश की राजनीति को भारतीय लोकतंत्र का हृदयस्थल माना जाता है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर गुजरता है, यही कारण है कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में होने वाली हर छोटी-बड़ी राजनीतिक हलचल का असर राष्ट्रीय फलक पर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2026 की समाप्ति के करीब आते ही और 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल पूरी तरह से शुरू हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने सूबे की राजनीतिक जमीन को जो नई शक्ल दी थी, उसके बाद हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटा है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रचने की कवायद में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे दस साल के सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इस बार का चुनाव केवल पारंपरिक नारों या वादों पर आधारित नहीं रहने वाला, बल्कि यह जमीन पर रची जा रही नई सामाजिक और गठबंधन राजनीति की प्रयोगशाला बनने जा रहा है।
इस राजनीतिक उठापटक और नए समीकरणों के निर्माण के बीच हाल ही में लखनऊ से एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक खबर सामने आई, जिसने राज्य के सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका के बीच लखनऊ में लगभग 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक चली बंद कमरे की मैराथन मुलाकात ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस मुलाकात के मायने केवल एक शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 2027 के महासमर से पहले उत्तर प्रदेश की युवा और छात्र राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आशुतोष रांका और अखिलेश यादव के बीच हुई इस चर्चा के केंद्र में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के नौजवानों के मुद्दे, लगातार होती परीक्षाओं के पेपर लीक, बेरोजगारी, छात्रों की समस्याएं और उच्च शिक्षा में आ रही गिरावट जैसे विषय शामिल रहे।
इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh BJP Regional Team 2027 | यूपी बीजेपी ने सभी छह क्षेत्रों की नई टीमों का किया ऐलान, सामाजिक समीकरण साधने पर जोर | Full List
पार्टी के भीतर और बाहर इस मुलाकात को ‘प्लान 2027’ के एक अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और बेहद जागरूक मतदाता वर्ग तैयार हो चुका है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक ‘जेन-जी’ या पहली बार मतदान करने वाले युवा कहते हैं। यह युवा वर्ग पारंपरिक जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और आधुनिक अवसरों की मांग कर रहा है। अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि केवल पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण या केवल सामान्य गठबंधनों के बूते भाजपा जैसी विशाल और साधन-संपन्न चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद सपा अब छोटे-छोटे वैचारिक समूहों, छात्र संगठनों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा के उस युवा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है, जो कभी भगवा दल की सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था। रांका और अखिलेश यादव की यह मुलाकात इस बात की तस्दीक करती है कि विपक्ष इस बार युवाओं के आक्रोश को एक ठोस राजनीतिक वोट बैंक में बदलने की मुकम्मल तैयारी कर चुका है।
हालांकि, इस मुलाकात पर भाजपा ने भी फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस नीति या विकास का एजेंडा नहीं है, इसलिए वह केवल भ्रम फैलाने और छोटे-छोटे संगठनों के सहारे अपनी डूबती नैया बचाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन राजनीति के जानकार इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसके मूल में युवाओं और छात्रों का आंदोलन या उनका असंतोष ही रहा है। ऐसे में सीजेपी जैसी युवा केंद्रित ताकतों और सपा का करीब आना भविष्य के एक नए और बड़े सामाजिक-राजनैतिक मोर्चे की बुनियाद रख सकता है।
यदि हम उत्तर प्रदेश की समूची राजनैतिक बिसात पर नजर डालें, तो इस समय सबसे बड़ा टकराव नैरेटिव यानी विमर्श गढ़ने को लेकर चल रहा है। समाजवादी पार्टी ने इस बार ‘आरक्षण’ और ‘संविधान’ को अपनी राजनीति के केंद्र में रख दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को ‘संविधान बचाओ’ के नारे से जो अप्रत्याशित लाभ मिला था, अखिलेश यादव उसे 2027 तक कायम रखना चाहते हैं। हालिया महीनों में उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति, 69000 शिक्षक भर्ती का विवाद और पिछड़े-दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर सपा ने एक आक्रामक रुख अख्तियार किया है। अखिलेश यादव लगातार जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वर्तमान सत्ताधारी दल दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रच रहा है। इस नैरेटिव के जरिए सपा सीधे तौर पर भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर निशाना साध रही है, जिसने पिछले एक दशक से भाजपा की जीत में रीढ़ की हड्डी का काम किया है।
सपा की इस रणनीति के जवाब में भारतीय जनता पार्टी भी खामोश नहीं बैठी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी संगठन मशीनरी को पूरी तरह से चुनावी मोड में डाल दिया है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर का ढांचा माना जाता है। पार्टी ने इस बार कागजी दावों को खारिज करते हुए हर एक बूथ कमेटी का भौतिक सत्यापन शुरू किया है। खासकर उन बूथों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जहां पिछले चुनाव में विपक्ष को बढ़त मिली थी। इसके साथ ही, भाजपा सरकार अपनी कानून-व्यवस्था की सख्त छवि, बुनियादी ढांचे का विकास (जैसे एक्सप्रेसवे और औद्योगिक गलियारे) और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के एक बड़े नेटवर्क के भरोसे मैदान में उतर रही है। भाजपा का मानना है कि विकास और सुशासन का उनका यह ‘डबल इंजन’ मॉडल विपक्ष के जातिगत ध्रुवीकरण के प्रयासों को विफल कर देगा।
लेकिन इस बार एनडीए गठबंधन के भीतर की आंतरिक खींचतान भी पूरी तरह सतह पर आ चुकी है। गठबंधन में शामिल छोटे दल जैसे निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद, अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सीटों के सम्मानजनक बंटवारे के लिए भाजपा पर लगातार दबाव बना रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के भावुक होने और आंसुओं के छलकने की घटना ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भारी उबाल ला दिया था। जहां संजय निषाद ने इसे अपने समाज को हक न मिल पाने की पीड़ा बताया, वहीं अखिलेश यादव ने तुरंत इस पर तंज कसते हुए इसे भाजपा के साथ जाने का ‘पश्चाताप और प्रायश्चित’ करार दे दिया। यह घटना दर्शाती है कि निषाद और अन्य अति-पिछड़ी जातियों के वोट बैंक को लेकर दोनों पक्षों में कितनी जबर्दस्त रस्साकशी चल रही है। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि निषाद समाज भी उनके ‘PDA’ का एक अभिन्न हिस्सा है और यदि उनकी सरकार आती है, तो वे जातीय जनगणना कराकर हर समाज को उसका वास्तविक हक देंगे।
दूसरी तरफ, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच का ‘इंडिया’ गठबंधन भी एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। यद्यपि अखिलेश यादव और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने बार-बार यह दोहराया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दल मिलकर लड़ेंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर सीटों के बंटवारे और प्रादेशिक नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के बीच महत्वाकांक्षाओं का टकराव साफ दिखाई देता है। कांग्रेस जहां लोकसभा चुनाव के उत्साह के बाद उत्तर प्रदेश में अपने पुराने गौरव को हासिल करने के लिए अधिक सीटों की मांग कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी खुद को बड़े भाई की भूमिका में रखते हुए कांग्रेस को सीमित सीटों पर समेटने की रणनीति बना रही है। इसके अतिरिक्त, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की खामोशी और उनकी अंदरूनी बैठकें भी इस त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना रही हैं। मायावती अपने खिसकते दलित वोट बैंक को सहेजने के लिए नए सिरे से कैडर कैंप आयोजित कर रही हैं। यदि बसपा अपने पारंपरिक वोट को बचाने में सफल रहती है, तो इसका सीधा नुकसान सपा-कांग्रेस गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, जिससे अंततः भाजपा को लाभ होने की संभावना बढ़ जाएगी।
सियासत के इस खेल में शह और मात के मोहरे बिछ चुके हैं। जनता शांत है, लेकिन वह हर दल की चालों को बहुत बारीकी से देख रही है। रोजगार की तलाश में भटकता युवा, महंगाई से जूझता आम नागरिक और अपने अधिकारों के प्रति सजग होता जातियों का समूह ही अंततः यह तय करेगा कि 2027 में लखनऊ के सिंहासन पर किसका राजतिलक होगा। फिलहाल, राजनैतिक दलों की यह सरगर्मी और रणनीतिक मुलाकातों का दौर यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी संग्राम बेहद रोमांचक, अप्रत्याशित और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
– अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
