यश ने अपने करियर में कई ऐसे किरदार निभाए हैं, जिन्होंने उन्हें मास हीरो से लेकर एक पैन-इंडिया स्टार तक की पहचान दिलाई है, लेकिन ‘टॉक्सिक’ में उनका अंदाज पहले के किरदारों से काफी अलग नजर आता है। जहां ‘केजीएफ’ के रॉकी भाई में गुस्सा, बदला और दबदबा हावी था, वहीं यहां यश एक ही फिल्म में राया और टिकट जैसे दो बिल्कुल अलग किरदारों के जरिए अपनी रेंज दिखाते हैं। एक तरफ राया की दुनिया में खौफ और ताकत है, तो दूसरी तरफ टिकट में भावनाओं और रिश्तों का पहलू है। यही फर्क ‘टॉक्सिक’ को यश की पिछली फिल्मों से अलग करता है और उनके स्टारडम के साथ उनकी परफॉर्मेंस का एक नया रंग सामने लाता है।
डायरेक्टर: गीतू मोहनदास
कास्ट : यश, कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरेशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत
ड्यूरेशन: 3 घंटे 14 मिनट
रेटिंग – 3.5
अपराध की दुनिया से रिश्तों की कहानी तक
‘टॉक्सिक’ की कहानी राया की दुनिया से शुरू होती है, जहां ताकत, अपराध और वफादारी के अपने नियम हैं। उसका बेटा टिकट जब इस दुनिया का हिस्सा बनता है, तो कहानी सिर्फ गैंगस्टर और एक्शन तक सीमित नहीं रहती। पिता-पुत्र के रिश्ते के साथ परिवार, प्यार, बदला और अपने लोगों के लिए खड़े होने की भावनाएं भी कहानी में जुड़ती जाती हैं।
गंगा और नादिया जैसे किरदार इस कहानी को एक इमोशनल एंगल देते हैं। फिल्म की शुरुआत में घटनाएं एक एक्शन ड्रामा की तरह आगे बढ़ती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसके किरदारों और उनके रिश्तों की कई परतें खुलने लगती हैं। जैसे-जैसे राया और टिकट की दुनिया के राज सामने आते हैं, कहानी का माहौल और ज्यादा खतरनाक होता जाता है। वहीं क्लाइमैक्स में आने वाला ट्विस्ट कहानी को एक नई दिशा देता है और फिल्म खत्म होने के बाद भी कई सवाल दर्शकों के मन में छोड़ जाती है।
यश के डबल रोल में दिखा अलग-अलग रंग
यश ‘टॉक्सिक’ में राया और उसके बेटे टिकट, दोनों किरदारों में नजर आते हैं। दोनों एक ही परिवार से जुड़े हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व और अंदाज में जमीन-आसमान का फर्क है। राया के किरदार में गैंगस्टर की दुनिया का दबदबा, आक्रामकता और आत्मविश्वास दिखाई देता है, जबकि टिकट ज्यादा शांत और भावनाओं से जुड़ा हुआ नजर आता है।
यश ने दोनों किरदारों के बीच इस फर्क को अपनी बॉडी लैंग्वेज, हाव-भाव और स्क्रीन प्रेजेंस के जरिए अच्छी तरह दिखाया है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दोनों के व्यक्तित्व और रिश्ते की नई परतें सामने आती हैं। यही बदलाव यश के डबल रोल को फिल्म के दिलचस्प हिस्सों में शामिल करता है।
सपोर्टिंग कास्ट ने भी छोड़ी अपनी छाप
यश के साथ फिल्म की बाकी कास्ट भी कहानी को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती है। नयनतारा गंगा के किरदार में फिल्म के इमोशनल हिस्से को मजबूती देती हैं, जबकि कियारा आडवाणी नादिया के रूप में अपने किरदार में संवेदनशीलता और गर्मजोशी लेकर आती हैं। हुमा कुरैशी की एलिजाबेथ भी अपने अंदाज और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस से ध्यान खींचती हैं।
रुक्मिणी वसंत मेलिसा के किरदार में खास तौर पर प्रभावित करती हैं। उनका अभिनय ज्यादा दिखावटी नहीं है, लेकिन उनकी खामोशी और सहज अंदाज किरदार को असरदार बनाता है। वहीं तारा सुतारिया की रेबेका, अक्षय ओबेरॉय के टोनी, डैरेल डी’सिल्वा के साल्वाडोर और सुदेव नायर के करमाडी भी कहानी में अपनी अलग मौजूदगी दर्ज कराते हैं। इन सभी किरदारों की वजह से फिल्म की दुनिया ज्यादा बड़ी और दिलचस्प लगती है।
इंटरवल के बाद बदल जाता है ‘टॉक्सिक’ का अंदाज
फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को राया की दुनिया और उसके आसपास के रिश्तों से रूबरू कराता है। यहां मास एंटरटेनमेंट के साथ कहानी और किरदारों पर भी ध्यान दिया गया है। गीतू मोहनदास ड्रामा और गैंगस्टर वर्ल्ड को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं, जिससे फिल्म की नींव मजबूत होती है। फिर इंटरवल में एक बड़ा सीक्वेंस आता है, जो कहानी को नई दिशा देने के साथ कई सवाल भी छोड़ जाता है।
इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार और टोन दोनों बदल जाते हैं। सेकंड हाफ में एक्शन पहले से कहीं ज्यादा बड़ा, तेज और इंटेंस हो जाता है। कहानी भी ज्यादा खतरनाक और असल नजर आने लगती है। बड़े सेट और शानदार स्केल के बीच एक्शन सीन्स की रॉ एनर्जी सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है और यही हिस्सा फिल्म को बड़े पर्दे का दमदार अनुभव बनाता है।
गीतू मोहनदास की कहानी कहने की शैली
गीतू मोहनदास ने ‘टॉक्सिक’ को सिर्फ एक बड़े एक्शन ड्रामा के तौर पर पेश नहीं किया है, बल्कि इसकी दुनिया को काफी विस्तार दिया है। फिल्म में कई किरदार हैं और लगभग हर किरदार की अपनी कहानी, सोच और मकसद है। इन सभी को एक साथ सामने रखने के बजाय निर्देशक ने उन्हें धीरे-धीरे कहानी का हिस्सा बनाया है।
फिल्म हर बात का जवाब तुरंत देने की कोशिश नहीं करती। कई घटनाएं और किरदारों से जुड़े राज समय के साथ सामने आते हैं, जिससे दर्शक खुद कहानी की कड़ियों को जोड़ते रहते हैं। यही तरीका फिल्म को दिलचस्प बनाए रखता है और इसकी कई परतों को हर सीन के साथ समझने का मौका देता है।
क्यों है मस्ट वॉच
अगर आपको बड़े पर्दे पर दमदार एक्शन के साथ ऐसी कहानी देखना पसंद है, जिसमें रिश्ते, प्यार, परिवार और इमोशन भी बराबर मौजूद हों, तो ‘टॉक्सिक’ आपके लिए सही फिल्म हो सकती है। यश का डबल रोल, कहानी में लगातार खुलती परतें, सेकंड हाफ का जबरदस्त एक्शन और क्लाइमैक्स का ट्विस्ट फिल्म को खास बनाते हैं। इसका बड़ा स्केल और शानदार विजुअल्स थिएटर में इसके अनुभव को और बेहतर करते हैं। खासकर यश के फैंस के लिए यह फिल्म मस्ट वॉच कही जा सकती है।