अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के असैन्य परमाणु कार्यक्रम को मजबूती देने के उद्देश्य से तैयार किए गए द्विपक्षीय समझौते को अंतिम समीक्षा के लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को भेज दिया है। हालाँकि, इस समझौते को आगे बढ़ाने के लिए ट्रंप प्रशासन ने एक बेहद कूटनीतिक और सख्त शर्त रखी है—सऊदी अरब को इज़राइल के साथ अपने राजनयिक संबंधों को सामान्य करना होगा और ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) का हिस्सा बनना होगा। यह गोपनीय दस्तावेज अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत सोमवार को समीक्षा के लिए सौंपा गया। समझौते पर वाशिंगटन में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और उनके सऊदी समकक्षी ने हस्ताक्षर किए थे।
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ट्रंप प्रशासन का बड़ा दांव
ट्रंप प्रशासन के अधिकारी, कांग्रेस के एक सहयोगी और मामले से परिचित दो अन्य लोगों के अनुसार, परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत जरूरी प्रक्रिया के तहत यह गोपनीय दस्तावेज सोमवार को कांग्रेस को सौंपा गया।
इस समझौते पर पिछले महीने वाशिंगटन में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और उनके सऊदी समकक्ष ने हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, इसके अगले ही दिन ट्रंप ने घोषणा की कि समझौते के तहत सऊदी अरब को ‘अब्राहम समझौते’ के जरिए इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने होंगे। उनकी इस घोषणा के बाद समझौते के लागू होने को लेकर संदेह पैदा हो गया था।
प्रशासन के अधिकारी और मामले से परिचित अन्य लोगों ने इस बारे में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि क्या सऊदी अरब के अब्राहम समझौते में शामिल होने की ट्रंप की मांग को कांग्रेस को भेजे गए गोपनीय दस्तावेज में भी शामिल किया गया है।
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कानून के तहत कांग्रेस को सत्र के दौरान 90 दिनों तक इस समझौते की समीक्षा करनी होगी। यदि इस अवधि के दौरान कांग्रेस समझौते को खारिज करने वाला संयुक्त प्रस्ताव पारित नहीं करती है तो दोनों सदनों में मतदान के बिना ही समझौता प्रभावी हो सकता है।
इस तरह के समझौतों की पूरी सामग्री का इतने उच्च स्तर पर गोपनीय रखा जाना असामान्य है। अन्य देशों के साथ किए गए पिछले असैन्य परमाणु समझौते, जिन्हें ‘123 समझौते’ के नाम से जाना जाता है, सार्वजनिक किए गए थे।
हालांकि, इनमें से कुछ में ऐसे गोपनीय परिशिष्ट शामिल थे जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया था।
वाशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास ने इस मामले पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की।
हालांकि, सऊदी अरब के अब्राहम समझौते में शामिल होने पर ट्रंप के लगातार जोर देने से समझौते को अंतिम मंजूरी मिलने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। 2020 में हुए इन समझौतों के तहत इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले अरब और मुस्लिम बहुल देशों की संख्या बढ़ी थी।
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