टाटा सन्स ने अपने जवाब में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के समर्थन में 3 कानूनी राय का हवाला दिया है। इनमें पूर्व प्रधान न्यायाधीश यू.यू. ललित और पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बी.एन. श्रीकृष्ण की राय भी शामिल हैं। कंपनी का कहना है कि 17 सितंबर को बोर्ड में लिया गया फैसला टाटा सन्स के नियमों के अनुरूप है।
कंपनी ने नोएल टाटा को यह भी बताया है कि चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर फैसला लेते समय बोर्ड के निदेशकों ने कंपनी के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अनुसार काम किया है। एक सूत्र के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स की कानूनी टीम फिलहाल टाटा सन्स के जवाब की जांच कर रही है। टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स ने इस मामले पर कारोबारी समय के बाहर पूछे गए सवालों का तत्काल जवाब नहीं दिया है।
गौरतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स का कहना है कि चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाए जाने का फैसला तब तक लीगल नहीं माना जा सकता, जब तक ट्रस्ट्स की ओर से नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन न मिले। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में ट्रस्ट्स के 2 नामित निदेशकों के रुख में अंतर रहा था।
ट्रस्ट्स का कहना है कि उनके नामित निदेशकों के समर्थन की अलग से जरूरी शर्त है। वहीं टाटा सन्स का पक्ष है कि बोर्ड में मत बराबर होने की स्थिति में चेयरमैन को निर्णायक मत देने का अधिकार हासिल है और इसी आधार पर फैसला पूरा हुआ है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 12 अगस्त को हुई थी, जब चंद्रशेखरन ने अपने मौजूदा कार्यकाल के खत्म होने के बाद दोबारा पद संभालने की इच्छा नहीं जताई थी। उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होना था। इसके बाद 17 सितंबर को टाटा सन्स के बोर्ड ने उन्हें अगले 5 साल के लिए फिर से चेयरमैन बनाने का फैसला किया। टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है।
बता दें कि टाटा समूह करीब 158 साल पुराना कारोबारी समूह है और टाटा सन्स उसकी प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। हालिया विवाद सिर्फ चेयरमैन की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। दोनों पक्षों के बीच टाटा सन्स की संभावित सूचीबद्धता समेत कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। सितंबर में बोर्ड ने कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने की संभावना पर भी विचार करने का फैसला किया था।
चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के साथ उनका निदेशक पद भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, चेयरमैन पद पर बने रहने के लिए निदेशक के तौर पर उनकी दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया भी जरूरी है। टाटा सन्स की वार्षिक आम बैठक पहले टल चुकी है और कंपनी को इसे दिसंबर तक कराने के लिए समय मिला है।
इस तरह टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद अब बोर्डरूम से आगे बढ़कर कानूनी नियमों की व्याख्या तक पहुंच गया है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने कानूनी आधार पर कायम हैं और टाटा ट्रस्ट्स की कानूनी टीम टाटा सन्स के ताजा जवाब की समीक्षा कर रही हैं। आगे इस मामले में क्या कदम उठाया जाता है, इस पर कारोबारी जगत की नजर बनी हुई हैं।
