सड़क पर यातायात नियम तोड़कर चालान कटवाना आसान है, लेकिन अब उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लंबित ई-चालानों की वसूली के लिए ऐसा तंत्र बनाने की जरूरत बताई है, जिससे नियम तोड़ने वालों को जुर्माना चुकाने के लिए मजबूर होना पड़े। अदालत ने यहां तक सुझाव दिया कि बकाया यातायात चालान को बिजली बिल से जोड़ दिया जाए। बिजली का बिल नहीं चुकाने पर जिस तरह बिजली काटने की कार्रवाई होती है, उसी तरह चालान की वसूली सुनिश्चित करने का रास्ता खोजने की बात अदालत ने कही।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने साफ कहा कि केवल हजारों-लाखों ई-चालान काटते रहना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल जुर्माने की वसूली का है। अदालत के सामने रखे आंकड़ों के मुताबिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में करीब 45 हजार करोड़ रुपये के ई-चालान जारी किए गए हैं, जिनमें लगभग 25 हजार करोड़ रुपये ही वसूल हो पाए हैं। यानी करीब 20 हजार करोड़ रुपये अब भी बकाया हैं।
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यह सुनवाई 2012 से लंबित सड़क सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिका के तहत हुई। अदालत ने लंबित चालानों से निपटने के लिए कई कठोर विकल्पों पर भी विचार किया। बकाया चालान वाले वाहनों को काली सूची में डालने, वाहन का स्वामित्व हस्तांतरण रोकने और पंजीकरण प्रमाणपत्र के नवीनीकरण पर रोक जैसे उपायों की चर्चा हुई। यहां तक कि ऐसे वाहनों के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र और फिटनेस प्रमाणपत्र रोकने तथा चालक के लाइसेंस के नवीनीकरण पर भी कार्रवाई का सुझाव सामने आया।
अदालत ने परिवहन संबंधी ऑनलाइन व्यवस्था पर ऐसे वाहनों को चिह्नित करने और बकाया चालान साफ होने तक स्वामित्व परिवर्तन रोकने की बात कही। इसके साथ ही सड़कों पर रेंडम चेक बढ़ाने का सुझाव भी दिया गया, ताकि पता चल सके कि किन वाहनों पर पुराने ई-चालान लंबित हैं। हम आपको बता दें कि राजधानी दिल्ली के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को और ज्यादा उजागर करते हैं। 28 सितंबर 2026 तक दिल्ली में यातायात चालानों और कैमरे से जारी नोटिसों की कुल लंबित दर करीब 73 प्रतिशत है। मौके पर काटे गए करीब 1.7 करोड़ चालानों में लगभग 1.1 करोड़ लंबित हैं, जबकि कैमरे से जारी करीब 4.5 करोड़ नोटिसों में लगभग 3.4 करोड़ का भुगतान नहीं हुआ है। कैमरा आधारित नोटिसों की लंबित दर करीब 75.8 प्रतिशत, जबकि मौके पर काटे गए चालानों की लंबित दर करीब 66.4 प्रतिशत है।
बकाया चालानों में सबसे ऊपर तेज रफ्तार है, जिसके करीब 1.7 करोड़ चालान लंबित हैं। इसके बाद गलत पार्किंग के करीब 85.4 लाख, बिना हेलमेट करीब 47.8 लाख और लालबत्ती तोड़ने के करीब 47.5 लाख मामले हैं। इस साल 28 सितंबर तक भी तेज रफ्तार के करीब 18.5 लाख, गलत पार्किंग के 17.3 लाख और बिना हेलमेट के 11.2 लाख चालान दर्ज हुए हैं। वसूली की राह में भुगतान प्रक्रिया भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई लोग लोक अदालतों का इंतजार करते हैं। कुछ मामलों में 2,000 रुपये का चालान लोक अदालत में 200 रुपये में निपटने की संभावना बताई जाती है। दूसरी ओर, रोज नए चालान बनते हैं, जबकि लोक अदालतें निश्चित समय पर लगती हैं, जिससे लंबित मामलों का ढेर बढ़ता रहता है। वहीं तेज रफ्तार के मामलों में ऑनलाइन भुगतान की समयसीमा 90 दिन है, जबकि लालबत्ती उल्लंघन में शिकायत दर्ज कराने के लिए 15 दिन की अवधि होती है। इसके अलावा चालान संदेशों के अनियमित पहुंचने और मौके पर तत्काल भुगतान न कर पाने की स्थिति भी वसूली को प्रभावित करती है।
हालांकि दिल्ली में व्यवस्था सुधारने की कोशिशें तेज हुई हैं। सितंबर 2025 में दिल्ली यातायात पुलिस ने ई-चालान व्यवस्था को भारत बिल भुगतान प्रणाली से जोड़ा, जिससे पुराने और मौजूदा समझौता योग्य चालानों का भुगतान यूपीआई आधारित माध्यमों से किया जा सकता है। नागरिकों को व्हाट्सऐप के जरिए भी चालान की सूचना भेजी जा रही है। सूत्रों के अनुसार इन दोनों व्यवस्थाओं के बाद चालान भुगतान में पांच गुना वृद्धि हुई है। इसके अलावा, लोक अदालतों और शाम की अदालतों के बाद अब सप्ताहांत में भी सुनवाई बढ़ाने की कोशिश हो रही है और अधिक पीठों के जरिए मामलों के निपटारे की गति बढ़ाई जा रही है। देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि सड़क पर नियम तोड़कर चालान कटवाना समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। अब चुनौती चालान काटने की नहीं, हर बकाया रुपये की वसूली की है।
उधर, सोशल मीडिया पर इस सुझाव को लेकर प्रतिक्रियाएं मिश्रित दिखाई दे रही हैं। कुछ लोगों ने इसे लंबित चालानों की वसूली सुनिश्चित करने के लिए कड़ा और व्यावहारिक दबाव बनाने वाला विचार बताया, जबकि कई लोगों ने सवाल उठाया कि बिजली का बिल पूरे परिवार या मकान से जुड़ा होता है, जबकि यातायात उल्लंघन किसी एक व्यक्ति या वाहन से संबंधित होता है। किरायेदार, साझा बिजली कनेक्शन और वाहन बेचने या स्थान बदलने जैसे मामलों को लेकर भी लोगों ने व्यावहारिक दिक्कतें गिनाईं। कुछ प्रतिक्रियाओं में यह सवाल भी उठाया गया कि चालान वसूलने के लिए वाहन, पंजीकरण या अन्य परिवहन संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा सीधा रास्ता हो सकता है। सोशल मीडिया की चर्चाओं में यह तथ्य भी सामने आया कि चालान वसूली से ज्यादा ध्यान सड़कों की हालत सुधारने पर देना चाहिए ताकि लोग दुर्घटनाओं के शिकार नहीं हों।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
