शिवसेना (उबाठा) सांसद संजय राउत ने रविवार को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए दिल्ली को ‘‘हिरासत वाला राज्य’’ करार दिया। राउत ने यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन सभी लोगों से जुड़े हैं, जिन्हें लोकतंत्र में विश्वास है। उन्होंने शनिवार को मुंबई में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर महाराष्ट्र सरकार की भी आलोचना की और कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।
पुलिस ने शनिवार को दिल्ली में कई स्थानों पर 7,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया था और उन्हें जंतर-मंतर पहुंचने से रोक दिया था। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से पहले दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिए जाने के बाद एहतियातन गिरफ्तार किए गए कॉजपा नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को रविवार सुबह कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के बाद रिहा कर दिया गया। कॉजपा की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने बताया कि उन्हें एक साल तक ‘‘शांति भंग नहीं करने’’ की शर्त पर रिहा किया गया।
राउत ने कहा कि कॉजपा के लोगों को हिरासत में लिये जाने के बावजूद प्रदर्शन नहीं रुके। उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘दिल्ली हिरासत वाला राज्य बन गई है। जब हिरासत वाला राज्य और पुलिस राज होता है, तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि देश में आपातकाल है।’’
राज्यसभा सदस्य ने कहा कि 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान हेमवती नंदन बहुगुणा और जगजीवन राम जैसे कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी।
उन्होंने दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी ऐसी ही बेचैनी है। राउत ने कहा कि किसी बड़े नेता ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मजबूती से बचाव नहीं किया है और अगले साल मार्च-अप्रैल तक राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव होगा। राउत ने किसी का नाम लिये बिना कहा, ‘‘देश में पैदा हो रही स्थिति के कारण केवल अन्य दलों में ही नहीं, बल्कि भाजपा में भी बेचैनी है।
भाजपा के चार बड़े नेता देश हित में फैसला करेंगे। ये नेता असली भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा वाले हैं। ये चारों नेता (मोदी) मंत्रिमंडल में हैं और भाजपा के प्रमुख स्तंभ हैं।’’
उन्होंने दावा किया, ‘‘ये लोग आपस में विचार-विमर्श और चर्चा कर रहे हैं कि हमें फैसला लेना होगा… ठीक वैसे ही, जैसे जगजीवन राम और हेमवती नंदन बहुगुणा ने लिया था।’’
राउत ने जर्मनी के नेता एडोल्फ हिटलर और इटली के बेनितो मुसोलिनी से तुलना करते हुए कहा कि उन्होंने सत्ता के अंतिम दिनों में इसी तरह के तरीके अपनाए थे।
इनमें प्रदर्शनों पर रोक लगाना, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करना और लोगों को नजरबंद करना शामिल था। उन्होंने कहा कि भारत में भी ऐसी ही स्थिति है।
