(लॉरेण्ट बोनेफोय, साइंसेज पीओ)
पेरिस, 15 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर किए गए घातक हमले ने सऊदी अरब के साथ उनके बढ़ते संघर्ष और खुद को ईरान के इशारे पर काम करने वाले संगठन के रूप में देखे जाने की धारणा बदलने की कोशिश को उजागर किया है।
दस अक्टूबर को हुए हमले में 13 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। फरवरी में ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने के बाद से सऊदी अरब की धरती पर यह सबसे हिंसक घटना थी। इसके बाद भी मिसाइल हमले किए गए।
यमन की राजनीति के विशेषज्ञ के अनुसार, ये घटनाएं पश्चिम एशिया में बढ़ते क्षेत्रीय तनाव और यमन में एक दशक से जारी युद्ध के व्यापक प्रभावों को दर्शाती हैं।
—– सऊदी अरब पर ध्यान केंद्रित कर रहे हूती —–
हूती आंदोलन 2004 में यमन में एक सशस्त्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरा था। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त और सऊदी अरब समर्थित सरकार के खिलाफ गृहयुद्ध लड़ रहा है। फिलहाल हूतियों का देश के करीब एक-तिहाई क्षेत्र और दो-तिहाई आबादी पर नियंत्रण है। उन्होंने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों और ड्रोन का बड़ा जखीरा तैयार किया है।
हूतियों को अक्सर ईरान का प्रतिनिधि संगठन बताया जाता है। हालांकि, ईरान से उनके संबंधों के बावजूद आंदोलन का विकास यमन की घरेलू राजनीति और उसके ऐतिहासिक संघर्षों से भी जुड़ा है।
लेखक के मुताबिक, 2026 में हूती नेतृत्व ने अपनी सैन्य कार्रवाइयों को इस तरह पेश करने की कोशिश की है कि वे ईरान के निर्देश पर की गई कार्रवाई न लगें। फरवरी में अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमले के बाद भी हूती कई महीनों तक संघर्ष से दूर रहे।
इसकी एक वजह यह थी कि फलस्तीनियों के समर्थन में कार्रवाई को अरब एकजुटता के रूप में पेश करना आसान था, जबकि ईरान के लिए लड़ने को यमन के घरेलू राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ में उचित ठहराना कठिन था।
अगस्त में क्षेत्रीय संघर्ष में लौटने के बाद हूतियों ने अपने राजनीतिक विमर्श में सऊदी अरब को प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करना शुरू किया। वे अपने सैन्य अभियान को मुख्य रूप से राष्ट्रीय रक्षा की कार्रवाई बताते हैं।
—– हवाई अड्डे पर हमले के बाद बढ़ा तनाव —–
लेख के अनुसार, जुलाई 2026 में सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को दोबारा खोलने की हूतियों की कोशिश के दौरान तनाव बढ़ा। इजराइली हमलों के बाद 2024 के आखिर से बंद हवाई अड्डे पर 13 जुलाई को सऊदी सेना ने बमबारी की, जब तेहरान से आने वाला विमान वहां पहुंचने वाला था।
हूतियों ने इसे सऊदी अरब के साथ टकराव फिर तेज करने का अवसर माना। अब वे सऊदी अरब के बंदरगाहों और तेल निर्यात से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने को जवाबी कार्रवाई के रूप में उचित ठहराते हैं।
हूतियों की इस रणनीति के दो उद्देश्य बताए गए हैं, पहला- यमन में आर्थिक और मानवीय संकट की जिम्मेदारी अपनी शासन संबंधी विफलताओं के बजाय सऊदी अरब की नाकेबंदी पर डालना और दूसरा- क्षेत्रीय संघर्ष को और बढ़ाने का आधार तैयार करना।
सितंबर की शुरुआत में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर कुछ हद तक नियंत्रण स्थापित करने के प्रयासों से हूतियों को लाल सागर में सऊदी अरब के लिए महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार पर दबाव बनाने का अवसर मिला। ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिये वे सऊदी अरब के बड़े हिस्से में स्थित ठिकानों को भी निशाना बना सकते हैं।
—– क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने की आशंका —–
यह स्पष्ट नहीं है कि हूतियों के इस तेजी से आक्रामक होते अभियान के क्या परिणाम होंगे। क्षेत्र में संघर्ष जारी रहने की आशंका है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इससे अमेरिका जैसे देश फिर संघर्ष में शामिल होंगे या नहीं। अमेरिका अब तक पूर्ण पैमाने पर क्षेत्रीय युद्ध में दोबारा उतरने से बचता रहा है।
लेकिन इन घटनाओं के बीच यमन के आम नागरिकों की दुर्दशा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह उस आबादी की पीड़ा की याद दिलाता है, जो एक दशक से अधिक समय से जारी युद्ध से थक चुकी है। इस युद्ध ने उस देश के पहले से ही सीमित बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है, जो संघर्ष शुरू होने से पहले ही पश्चिम एशया का सबसे गरीब देश था।
