राहुल गांधी का प्रयागराज आकर छात्रों से संवाद करना अपने आप में कोई असामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष के नेता का युवाओं के बीच जाना, उनकी समस्याएं सुनना और सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन राजनीति में किसी कार्यक्रम का समाचार बन जाना और उसका चुनावी प्रभाव पैदा करना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। यही अंतर उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की समस्याओं के खिलाफ एक बड़े अभियान के रूप में पेश किया है। प्रयागराज का चयन भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह देश के प्रमुख शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में गिना जाता है। कांग्रेस का दावा है कि वह छात्रों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहती है। लेकिन यहां पहला राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि क्या प्रयागराज में छात्रों की एक बड़ी सभा को पूरे उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं के राजनीतिक रुझान का संकेत मान लिया जाए?
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देखा जाये तो राजनीति में भीड़ और वोट के बीच संगठन नाम की एक चीज होती है। किसी नेता के कार्यक्रम में हजारों लोग आ सकते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकते हैं और मीडिया में कई घंटे तक बहस हो सकती है, लेकिन विधानसभा चुनाव 403 सीटों पर लड़ा जाता है। वहां उम्मीदवार चाहिए, स्थानीय नेतृत्व चाहिए, बूथ स्तर का संगठन चाहिए, चुनाव प्रबंधन चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा स्थायी मतदाता आधार चाहिए जो मतदान के दिन पार्टी के साथ खड़ा हो। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।
हम आपको याद दिला दें कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर लगभग 2.33 प्रतिशत रहा था। यह आंकड़ा किसी सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक पतन का संकेत था। हां, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय वापसी की। कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं और उसका प्रदर्शन 2022 की तुलना में स्पष्ट रूप से बेहतर हुआ। लेकिन इस सफलता का कारण समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन में शामिल होना था। दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और विपक्षी वोटों का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हुआ। इसलिए 2024 के परिणाम को सीधे-सीधे कांग्रेस के स्वतंत्र उत्तर प्रदेश जनाधार का प्रमाण मानना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी।
और यही सवाल 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कांग्रेस वास्तव में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर इतनी मजबूत हो चुकी है, तो फिर उसके अपने ही सांसदों और नेताओं को समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन जल्द तय करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? अभी एक दिन पहले ही तमाम समाचार रिपोर्टों में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के सांसदों द्वारा 2027 के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की मांग सामने आई है। साथ ही, प्रदेश कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर मतभेदों की खबरें भी आती रही हैं। इसलिए राहुल गांधी से एक सीधा सवाल पूछा जा सकता है कि अगर कांग्रेस का अपना जनाधार इतना मजबूत है, तो 2027 में उसे समाजवादी पार्टी के सहारे की जरूरत क्यों है?
वैसे यह सवाल गठबंधन के खिलाफ नहीं है। गठबंधन लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। लेकिन तब 2024 की सफलता को कांग्रेस की अकेले की ताकत बताना भी उचित नहीं होगा। यदि सफलता गठबंधन की संयुक्त ताकत से आई है, तो उसका श्रेय भी ईमानदारी से साझा करना होगा। यही कारण है कि प्रयागराज का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे 2027 के चुनाव की दिशा बदल देने वाला कार्यक्रम मानने के लिए अभी बहुत कुछ साबित होना बाकी है।
कांग्रेस को यह बताना होगा कि प्रयागराज की सभा के बाद वह कितने छात्रों को अपने साथ जोड़ पाती है। कितने जिलों में उसका छात्र संगठन सक्रिय है? कितने विधानसभा क्षेत्रों में उसका मजबूत स्थानीय संगठन है? कितनी सीटों पर वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की वास्तविक स्थिति में है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या छात्रों के मुद्दे को लेकर उसका अभियान चुनाव तक लगातार जमीन पर दिखाई देगा या यह भी दूसरे राजनीतिक अभियानों की तरह कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा? साथ ही कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि राहुल गांधी अब तक छात्रों की गूंज के जितने कार्यक्रम कर चुके हैं उसमें उमड़ी भीड़ में से कितने लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ली?
यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कांग्रेस के लिए युवाओं और छात्रों का मुद्दा उठाना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है, लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने से कोई पार्टी युवाओं का स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन जाती। छात्रों को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें समय पर परीक्षा चाहिए, पारदर्शी भर्ती चाहिए, पेपर लीक से सुरक्षा चाहिए, परिणाम और नियुक्ति में अनावश्यक देरी से मुक्ति चाहिए और ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें रोजगार के योग्य बनाए। इसलिए कांग्रेस से सवाल है कि वह केवल यह नहीं बताए कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी बताए कि कांग्रेस सत्ता में होती तो क्या अलग करती? कांग्रेस को सिर्फ सरकार की आलोचना करने की बजाय बताना चाहिए कि पेपर लीक रोकने के लिए उसका मॉडल क्या है? परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही कैसे तय होगी? भर्ती कैलेंडर को कानूनी या प्रशासनिक रूप से कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? परीक्षा और परिणाम के बीच समय सीमा क्या होगी? और अगर किसी परीक्षा में अनियमितता साबित होती है तो छात्रों के नुकसान की भरपाई का उसका मॉडल क्या होगा?
इसके अलावा, सरकार पर सवालों की बौछार कर रही कांग्रेस से भी उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल पूछा जाना चाहिए। देश और उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या पर इस तरह बोल नहीं सकती जैसे उसका इस व्यवस्था के निर्माण और उसकी कमियों से कोई संबंध ही नहीं रहा। इसलिए असली सवाल यह है कि “कांग्रेस ने दशकों तक देश और उत्तर प्रदेश में शासन किया। अगर आज शिक्षा व्यवस्था में इतनी गंभीर कमियां हैं, तो क्या कांग्रेस अपने लंबे शासन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है?” कांग्रेस से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि “अगर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल है, जैसा कांग्रेस अपने राजनीतिक अभियान में बताती है, तो स्वतंत्र ASER के आंकड़ों में पिछले वर्षों में कई बुनियादी learning outcomes में सुधार कैसे दिखाई दे रहा है?”
देखा जाये तो प्रयागराज में राहुल गांधी का कार्यक्रम इसलिए राजनीतिक रूप से दिलचस्प है क्योंकि यह केवल छात्र संवाद नहीं है। कांग्रेस स्वयं इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के प्रयास के रूप में देख रही है। लेकिन कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि छात्र और युवा मतदाता एकसमान राजनीतिक समूह नहीं हैं। किसी परीक्षा में पेपर लीक से नाराज छात्र जरूरी नहीं कि उसी कारण से विधानसभा चुनाव में किसी खास पार्टी को वोट दे। बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा हो सकती है, लेकिन उसके साथ कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, महिला मतदाता, किसान और क्षेत्रीय मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ को 2027 के चुनाव का निर्णायक संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि दो-तीन महीने पहले कांग्रेस ने रायबरेली में भी एक बड़ी जनसभा की थी और उसमें राहुल गांधी ने बड़ी हुंकार भरी थी लेकिन क्या उससे यूपी में कोई राजनीतिक समीकरण बना या बिगड़ा?
राहुल गांधी का प्रयागराज कार्यक्रम कांग्रेस को मीडिया की सुर्खियां दे सकता है। छात्रों के बीच राजनीतिक चर्चा पैदा कर सकता है। सरकार पर दबाव भी बना सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इससे उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित बदल गया है। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव किसी एक सभा, किसी एक भाषण या किसी एक नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होगा। वह बूथ पर तय होगा, विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों पर तय होगा, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता पर तय होगा और सबसे बढ़कर इस बात पर तय होगा कि कौन-सा गठबंधन किस वोट को वास्तविक मतदान में बदल पाता है। इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि “प्रयागराज के कार्यक्रम का क्या राजनीतिक असर होगा?” मुद्दा यह है कि 403 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन कितना बड़ा है? और कांग्रेस के पास शिक्षा और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का अपना ठोस व समयबद्ध समाधान क्या है?
साथ ही प्रयागराज के चयन को केवल छात्रों के मुद्दे तक सीमित करके देखना भी शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे पूर्वांचल की राजनीति में कांग्रेस की अपनी पुरानी राजनीतिक स्मृतियों को फिर से सक्रिय करने और उस भूगोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी को अपनी संसदीय राजनीति का प्रमुख आधार बनाया था और उसके बाद पूर्वांचल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। वाराणसी और प्रयागराज स्टेशनों के बीच मात्र एक जंक्शन की दूरी है। ऐसे में प्रयागराज का चयन पूर्वांचल के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में एक प्रतीकात्मक जवाब देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। एक तरफ मोदी का वाराणसी, दूसरी तरफ नेहरू-गांधी परिवार की इलाहाबाद-प्रयागराज की ऐतिहासिक स्मृति। साथ ही यह संयोग भी महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट 40 साल बाद वापस जीती थी। कांग्रेस के उज्ज्वल रमण सिंह ने भाजपा के नीरज त्रिपाठी को 58,795 मतों से हराया था और 1984 में अमिताभ बच्चन की जीत के बाद पहली बार कांग्रेस इस सीट पर लौटी। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ते थे। इसके साथ ही प्रयागराज में नेहरू परिवार से जुड़ी स्मृतियां जैसे कि आनंद भवन और स्वराज भवन आदि हैं और राहुल गांधी के दादा फिरोज जहांगीर गांधी की कब्र भी यहीं है।
बहरहाल, प्रयागराज के सफल कार्यक्रम के बाद अब सवाल यह है कि क्या यह विरासत आज के युवा मतदाता को उसी तरह राजनीतिक रूप से आंदोलित कर सकती है जैसे वह कांग्रेस के पुराने दौर में करती थी?
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
