देश में प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं पर हर बार राजनीतिक शोर मचता है, लेकिन उससे कहीं अधिक खतरनाक संकट देश की सुरक्षा को लगातार चुनौती दे रहा है। यह खतरा है संवेदनशील डाटा लीक होने की बढ़ती घटनाएं। यह सिर्फ कंप्यूटर से कुछ फाइलें चोरी होने का मामला नहीं, बल्कि भारत की सामरिक ताकत, वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा हमला है। कभी कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के लीक होने की खबर सामने आती है तो कभी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानि डीआरडीओ के संवेदनशील डाटा के डार्क वेब पर बिकने का दावा किया जाता है। ऐसे समय में जब भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रहा है, स्वदेशी मिसाइलों, हथियारों और अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों का विकास कर रहा है, तब देश की सबसे महत्वपूर्ण रक्षा अनुसंधान संस्था से जुड़े डाटा के कथित रूप से लीक होने की खबरें केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
हम आपको बता दें कि ताजा मामला रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़े कथित डाटा लीक का है। साइबर खतरे पर निगरानी रखने वाली तिरुवनंतपुरम स्थित एक साइबर फॉरेंसिक एवं रक्षा समाधान कंपनी ने दावा किया है कि लगभग 31 गीगाबाइट संवेदनशील डाटा डार्क वेब पर आठ हजार डॉलर में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया है। रिपोर्ट के अनुसार यह डाटा पिछले लगभग दो सप्ताह से बिक्री के लिए प्रदर्शित किया जा रहा है। सार्वजनिक रूप से साझा किए गए नमूना दस्तावेजों में वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुमोदन और हस्ताक्षरों से संबंधित प्रतिबंधित तकनीकी जानकारियां होने का दावा किया गया है।
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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उपलब्ध नमूना फाइलों में अत्याधुनिक मार्गदर्शन संवेदक की आंतरिक इलेक्ट्रॉनिक संरचना से जुड़ी जानकारियां शामिल हैं। यह वही तकनीक मानी जा रही है जिसका उपयोग सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलों और स्मार्ट आयुधों में किया जाता है। यदि इन दावों की पुष्टि होती है तो यह केवल डाटा चोरी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि देश की सामरिक क्षमताओं से जुड़ा अत्यंत गंभीर सुरक्षा विषय बन जाएगा।
हालांकि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने फिलहाल किसी भी तरह की पुष्टि नहीं की है। संगठन के सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट की प्रामाणिकता की जांच की जा रही है। जिस कंपनी ने इस कथित डाटा की पहचान की, उसका कहना है कि वह नियमित रूप से डार्क वेब, साइबर अपराध मंचों और फिरौती मांगने वाले गिरोहों की गतिविधियों पर नजर रखती है। कंपनी के तकनीकी निदेशक के अनुसार संदिग्ध दस्तावेज सामने आते ही मानक प्रक्रिया के तहत इसकी सूचना खुफिया ब्यूरो को दे दी गई थी। अब यह संबंधित सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे दस्तावेजों की सत्यता और संभावित क्षति का आकलन करें।
वहीं साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ भी इस पूरे मामले में जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि उपलब्ध नमूना दस्तावेजों की गहन तकनीकी और फॉरेंसिक जांच जरूरी है। यह भी पता लगाया जाना आवश्यक है कि यह डाटा वास्तव में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से ही लिया गया है या फिर किसी अन्य रक्षा इकाई से संबंधित है। जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि कथित रूप से चोरी किया गया डाटा वास्तव में कब बाहर निकाला गया। नमूना दस्तावेज वर्ष 2020 के बताए जा रहे हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यह कोई पुरानी सेंधमारी भी हो सकती है, जिसे अब चरणबद्ध तरीके से सार्वजनिक कर दबाव बनाने या धन उगाही के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो।
वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन का नाम किसी साइबर हमले से जुड़ा हो। पिछले वर्ष भी एक हैकर समूह ने संगठन के तंत्र में सेंध लगाने का दावा किया था। हालांकि उस समय सुरक्षा एजेंसियों की जांच में भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में किसी वास्तविक घुसपैठ की पुष्टि नहीं हुई थी। तब यह सामने आया था कि कुछ दस्तावेज इंटरनेट से जुड़े एक प्रशासनिक अधिकारी के कंप्यूटर से प्राप्त किए गए थे, न कि संगठन की सुरक्षित प्रणालियों से।
हम आपको याद दिला दें कि हाल ही में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के कथित लीक होने का मामला भी चर्चा में आया था। एक साइबर अपराधी गिरोह ने दावा किया था कि उसने परियोजना से संबंधित हजारों फाइलें हासिल कर ली हैं। इन दस्तावेजों में अभियांत्रिकी नक्शे, आपूर्तिकर्ताओं का विवरण और वर्षों की बैठकों से जुड़े अभिलेख होने की बात कही गई। हालांकि सरकार और परमाणु ऊर्जा निगम ने स्पष्ट किया था कि लीक हुए दस्तावेज केवल परियोजना के पारंपरिक निर्माण और सेवाओं से जुड़े अनुबंधों तक सीमित हैं। इनका परमाणु सुरक्षा, रिएक्टर संचालन या संवेदनशील परमाणु प्रणालियों से कोई संबंध नहीं है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी जानकारियां भी शत्रुतापूर्ण तत्वों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं, क्योंकि इनके आधार पर परियोजना से जुड़े सहयोगी ढांचे और ठेकेदारों को निशाना बनाया जा सकता है।
देखा जाये तो इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं में साइबर सुरक्षा को लेकर अपनाए जा रहे मानक पर्याप्त हैं। खुफिया अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के निर्देश जारी किए जाते रहे हैं, लेकिन यदि किसी स्तर पर चूक हुई है तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार पूर्ण सुरक्षा जैसी कोई स्थिति नहीं होती, इसलिए संस्थानों को लगातार अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी। सूचना प्रौद्योगिकी ढांचे का नियमित आधुनिकीकरण, सभी प्रणालियों का समय पर अद्यतन और साइबर सुरक्षा पर निरंतर निवेश अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।
बहरहाल, भारत रक्षा निर्माण, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और सामरिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसी गति से साइबर खतरे भी बढ़ रहे हैं। इसलिए अब केवल सीमाओं की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल सीमाओं की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक हो गई है। यदि डाटा सुरक्षित नहीं रहेगा तो आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी उपलब्धियां भी साइबर अपराधियों और शत्रु देशों के निशाने पर आ सकती हैं। इसलिए प्रश्नपत्र लीक की तरह डाटा लीक को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दे के रूप में देखने और उससे निपटने के लिए ठोस तथा दूरदर्शी रणनीति अपनाने का समय आ गया है।
