क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दक्षिण कोरिया को दरकिनार करते हुए उत्तर कोरिया के साथ रिश्ते बढ़ाने की राह पर हैं? क्या अमेरिका के पुराने सहयोगी देशों से रिश्ते बिगाड़ने या उन्हें दबाव में लाने की ट्रंप की नीति अब दक्षिण कोरिया तक पहुंच गई है? यह सवाल ट्रंप के ताजा फैसले के कारण उठ रहे हैं। हम आपको बता दें कि ट्रंप ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास उल्ची फ्रीडम शील्ड का पैमाना घटाने का आदेश दिया है। ट्रंप ने अपने इस फैसले की एक अहम वजह यह बताई है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान में सहयोग करने से दक्षिण कोरिया ने इंकार कर दिया था।
ट्रंप के मुताबिक उन्होंने दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्यांग से ईरान के मामले में अमेरिका की मदद करने को कहा था। ली ने कथित तौर पर इससे इंकार करते हुए कहा कि सियोल ईरान संघर्ष में शामिल नहीं होना चाहता। इसके बाद ट्रंप ने सवाल उठाया कि जब अमेरिका दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के लिए करीब 39,000 सैनिक तैनात रखता है और अरबों डॉलर खर्च करता है, तो फिर दक्षिण कोरिया अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में मदद क्यों नहीं करता। ट्रंप ने साफ संकेत दिया कि उनकी नजर में गठबंधन केवल सुरक्षा प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि लेन-देन का रिश्ता भी है।
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यही ट्रंप की इस पूरी रणनीति की कुंजी है। उनका तर्क सरल है कि अमेरिका अपने सहयोगियों की रक्षा पर भारी रकम खर्च करता है, इसलिए सहयोगियों को भी अमेरिकी रणनीतिक अभियानों में ज्यादा योगदान देना चाहिए। ट्रंप ने इसी तर्क को NATO पर भी लागू किया है और कहा है कि अमेरिका वहां भी सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करता है। यानी वाशिंगटन अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि सहयोगी अमेरिका से क्या हासिल कर रहे हैं, बल्कि यह भी पूछ रहा है कि वे अमेरिका के लिए क्या कर रहे हैं।
लेकिन दक्षिण कोरिया के मामले में समस्या कहीं ज्यादा गंभीर है। उल्ची फ्रीडम शील्ड कोई सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं है। यह उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल खतरे के खिलाफ अमेरिका और दक्षिण कोरिया की संयुक्त प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षों से वाशिंगटन इसे क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा की धुरी तथा दक्षिण कोरिया की रक्षा के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने का माध्यम मानता रहा है। ऐसे में अभ्यास को अचानक छोटा करना सिर्फ सैन्य कार्यक्रम में कटौती नहीं, बल्कि गठबंधन के राजनीतिक संदेश को भी कमजोर करता है।
यहीं ट्रंप का उत्तर कोरिया वाला रुख सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। ट्रंप ने कहा कि उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन के साथ उनके “बहुत अच्छे संबंध” हैं और उन्हें ऐसे सैन्य अभ्यास पसंद नहीं हैं जिन्हें प्योंगयांग शत्रुतापूर्ण मानता है। उन्होंने अभ्यासों को महंगा बताया और कहा कि वह उत्तर कोरिया को अनुचित और शत्रुतापूर्ण संकेत देते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने किम की तस्वीर के साथ सोशल मीडिया पर ऐसा संदेश भी पोस्ट किया, जिसका अर्थ था— “हम दोनों के बीच सब ठीक है न?”
इसका एक संभावित रणनीतिक कारण उत्तर कोरिया को फिर बातचीत की मेज पर लाना हो सकता है। 2019 में टूट चुकी परमाणु वार्ता को दोबारा शुरू कराने के लिए ट्रंप शायद किम को सैन्य दबाव कम होने का संकेत देना चाहते हैं। दक्षिण कोरिया ने भी उम्मीद जताई है कि ट्रंप और किम के व्यक्तिगत संबंधों के जरिए कोरियाई प्रायद्वीप पर बातचीत फिर शुरू हो सकती है। लेकिन समस्या यह है कि किम अब पहले से कहीं अधिक परमाणु हथियारों, मिसाइल परीक्षणों तथा रूस और चीन के साथ सहयोग पर निर्भर है और वह अमेरिका की परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिखता।
इस फैसले का सबसे बड़ा सामरिक जोखिम यही है कि अमेरिका उत्तर कोरिया से संवाद का दरवाजा खोलने के लिए दक्षिण कोरिया की सुरक्षा-आश्वस्ति को कमजोर न कर दे। अमेरिकी विशेषज्ञों ने चेताया है कि इससे दक्षिण कोरिया में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि अपनी सुरक्षा की गारंटी के लिए उसे खुद परमाणु हथियार विकसित करने पर विचार करना चाहिए। जापान और ताइवान जैसे अमेरिकी सहयोगियों में भी भरोसे का संकट पैदा हो सकता है, जबकि चीन और उत्तर कोरिया को रणनीतिक फायदा मिल सकता है।
हालांकि इसे अभी अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन के अंत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। अमेरिकी सैन्य अड्डे और मूल गठबंधन संरचना अभी कायम हैं। साथ ही ट्रंप का यह कदम स्थायी नीति परिवर्तन है या उनका एक और अप्रत्याशित राजनीतिक-सामरिक संदेश, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
फिर भी संदेश बेहद गंभीर है। ट्रंप चाहते हैं कि सहयोगी अपनी रक्षा पर ज्यादा खर्च करें और अमेरिका पर कम निर्भर रहें। देखा जाये तो ट्रंप की यह मांग नई नहीं है, लेकिन जब इस मांग को अपमान, धमकी और अचानक सैन्य फैसलों के साथ जोड़ा जाता है, तो गठबंधन की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी यानि विश्वास कमजोर होने लगता है। दक्षिण कोरिया के लिए अब मुद्दा यह नहीं है कि ट्रंप ने उसे “धोखा” दिया या नहीं। बड़ा विषय यह है कि क्या सियोल अब अमेरिकी सुरक्षा छाते पर पहले जितना भरोसा कर सकता है। और अगर इस सवाल का जवाब धीरे-धीरे “नहीं” होने लगा, तो इसका असर सिर्फ कोरियाई प्रायद्वीप पर नहीं, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत शक्ति संतुलन पर पड़ेगा।
