पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट के बीच चीन तेजी से वैश्विक कूटनीति का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित बीजिंग यात्रा से पहले ही ईरान ने वहां अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज करा दी है। इसी क्रम में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बुधवार को बीजिंग में चीन के शीर्ष राजनयिक से मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है तथा पूरी दुनिया की नजर चीन की भूमिका पर टिक गई है। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और मध्य पूर्व की स्थिरता से जुड़े इस संकट में बीजिंग अब एक महत्वपूर्ण शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहा है।
देखा जाये तो ईरानी विदेश मंत्री अराघची की यह चीन यात्रा विशेष महत्व रखती है क्योंकि हाल ही में अमेरिका और इजराइल के साथ हुए संघर्ष ने वैश्विक तेल आपूर्ति को गहरे संकट में डाल दिया था। इस युद्ध के कारण दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक चीन की ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हुई। चीन लंबे समय से ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और विश्लेषण संस्थान क्लेपर के अनुसार वर्ष 2025 में चीन ने ईरान से भेजे गए तेल का अस्सी प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदा। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल के खरीदार सीमित रहे हैं, क्योंकि वाशिंगटन का उद्देश्य तेहरान के परमाणु कार्यक्रम की वित्तीय आपूर्ति को रोकना है।
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इस बीच, अमेरिकी वित्त मंत्री स्काट बेसेंट ने चीन से अपील की है कि वह ईरान पर दबाव डाले ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए खोला जा सके। उन्होंने कहा कि ट्रंप और शी जिनपिंग आगामी चौदह और पंद्रह मई को बीजिंग में होने वाली बैठक में ईरान के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यापारिक संघर्षविराम के बाद अमेरिका और चीन अपने संबंधों को स्थिर बनाए रखना चाहते हैं।
बेसेंट ने चीन से अंतरराष्ट्रीय अभियान में शामिल होने का आह्वान किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि बीजिंग से किस प्रकार की कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। उन्होंने चीन और रूस पर संयुक्त राष्ट्र में उन प्रस्तावों को रोकने का आरोप भी लगाया जिनका उद्देश्य जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
उधर फारस की खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। दोनों पक्ष जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर समुद्री नाकेबंदी और सैन्य गतिविधियों में उलझे हुए हैं। हाल के दिनों में नए हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने संघर्षविराम को बेहद कमजोर बना दिया है। अमेरिकी नौसेना ने दावा किया है कि उसने जहाजों को सुरक्षा प्रदान करते हुए ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोका तथा तेज हमला करने वाली नौकाओं को नष्ट किया। दूसरी ओर तेहरान का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाइयों से नागरिक जहाजों और आम लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक हजार पांच सौ से अधिक जहाज और 22 हजार नाविक अब भी समुद्री मार्गों में फंसे हुए हैं। वैश्विक तेल बाजारों में भारी उतार चढ़ाव देखा जा रहा है और आशंका जताई जा रही है कि यदि संकट गहराया तो पूरी दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान “जीवित रहने की कोशिश” कर रहा है और वह समझौता करना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को पता है कि उसे क्या नहीं करना चाहिए। ट्रंप ने “प्रोजेक्ट फ्रीडम” नामक उस अभियान को अस्थायी रूप से रोकने की घोषणा भी की जिसके तहत अमेरिकी नौसेना होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों को सुरक्षित निकालने वाली थी। ट्रंप के अनुसार ईरान के साथ व्यापक समझौते की दिशा में “बहुत अच्छी प्रगति” हुई है, इसलिए इस अभियान को फिलहाल रोक दिया गया है।
हालांकि तेहरान की ओर से इस पर तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका की चेतावनियों और दबाव की राजनीति को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी शक्ति तेहरान को झुका नहीं सकती और शिया समुदाय को बल प्रयोग के जरिये मजबूर नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में पेजेशकियन ने बताया कि उन्होंने इराक के प्रधानमंत्री से बातचीत की है और अमेरिका से मध्य पूर्व से सैन्य धमकियां हटाने का आग्रह किया है।
ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने भी कहा है कि तेहरान बातचीत के रास्ते पर विचार कर रहा था, लेकिन उसके बाद हुए हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस संकट का कोई सैन्य समाधान संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि युद्ध और दबाव की नीति से केवल अस्थिरता बढ़ेगी।
देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका बेहद अहम बन गई है। बीजिंग ने एक ओर संघर्षविराम बनाए रखने और जलडमरूमध्य से प्रतिबंध हटाने की अपील की है, वहीं दूसरी ओर उसने अमेरिका की नीतियों की खुली आलोचना से भी दूरी बनाए रखी है। माना जा रहा है कि चीन नहीं चाहता कि ईरान संकट के कारण अमेरिका के साथ उसकी प्रस्तावित शिखर वार्ता प्रभावित हो। हम आपको बता दें कि पिछले सप्ताह चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए अपने वाणिज्य मंत्रालय के माध्यम से कंपनियों को निर्देश दिया कि वह ईरानी तेल खरीदने वाले चीनी रिफाइनरियों पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन न करें। इनमें हेंगली पेट्रोकेमिकल समेत पांच स्वतंत्र रिफाइनरियां शामिल हैं। चीन ने पहली बार ऐसे कानून का इस्तेमाल किया है जिसके तहत वह उन विदेशी संस्थाओं के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर सकता है जिन्हें वह अवैध प्रतिबंध लागू करने वाला मानता है।
बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि फारस की खाड़ी का यह संकट अब केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं रह गया है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और कूटनीतिक प्रभाव की परीक्षा बन चुका है।
