पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान अब देश की सुरक्षा, सीमाओं की गरिमा और भारत की जनसांख्यिकीय स्थिरता से जुड़ा राष्ट्रीय संघर्ष बन चुका है। दरअसल भारत की सीमाओं पर जिस तरह से लगातार घुसपैठ, अवैध बसावट, तस्करी और सीमा पार से अराजक गतिविधियां बढ़ रही हैं, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है। अब समय आ गया है कि घुसपैठियों को साफ और कठोर संदेश दिया जाए कि भारत कोई धर्मशाला नहीं, बल्कि कानून और राष्ट्रहित से चलने वाला शक्तिशाली राष्ट्र है।
बंगाल के साथ ही मेघालय सीमा पर सामने आया घटनाक्रम इस पूरे संकट की भयावह तस्वीर दिखाता है। बांग्लादेश का रहने वाला 55 वर्षीय सती राजबंशी अवैध रूप से भारत में घुस आया था। सीमा सुरक्षा बल ने उसे पकड़ा और वापस बांग्लादेश भेजने की कार्रवाई की। लेकिन बांग्लादेश सीमा रक्षक बल ने उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया। दोनों देशों की सेनाओं के बीच तीखी बहस हुई और वह व्यक्ति घंटों तक नो मैन्स लैंड में फंसा रहा। वायरल वीडियो में साफ दिखा कि बांग्लादेशी अधिकारी खुद उससे उसकी पहचान पूछते रहे, जबकि भारत विरोधी प्रचार करने की कोशिश भी जारी रही। आखिरकार जब उसकी पहचान राजशाही जिले के निवासी के रूप में सिद्ध हुई, तब जाकर बांग्लादेश को उसे स्वीकार करना पड़ा। यह घटना साबित करती है कि घुसपैठ केवल सीमा पार का अपराध नहीं, बल्कि संगठित साजिश का हिस्सा बन चुकी है। सीमा से लगे मेघालय के गांवों में भी लोग अब सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। कई ग्रामीणों ने मांग की है कि सीमा पर बाड सीधे जीरो लाइन पर बनाई जाए ताकि भारतीय गांव देश के भीतर सुरक्षित रह सकें। यह मांग बताती है कि सीमा पर रहने वाले नागरिक खुद महसूस कर रहे हैं कि घुसपैठ और सीमा पार गतिविधियां उनके भविष्य के लिए खतरा बन चुकी हैं।
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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश अब भारत पर ही उल्टे आरोप लगाने में जुटा हुआ है। ढाका सरकार ने भारत द्वारा सीमा पर कंटीले तार, चौकियां, सड़कें और सुरक्षा ढांचे के निर्माण पर आपत्ति जताई है। बांग्लादेश का दावा है कि भारत ने कई स्थानों पर उसकी अनुमति के बिना निर्माण किया। लेकिन सवाल यह है कि जब भारत अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहा है तो बांग्लादेश को तकलीफ क्यों हो रही है? क्या उसे यह डर सता रहा है कि मजबूत सीमा व्यवस्था से घुसपैठ और तस्करी का खेल बंद हो जाएगा?
देखा जाये तो भारत सरकार ने सीमा सुरक्षा को अभेद्य बनाने का जो अभियान शुरू किया है, वह समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने स्मार्ट सीमा सुरक्षा ग्रिड, एंटी ड्रोन सुरक्षा कवच, सेंसर आधारित निगरानी और अत्याधुनिक डिजिटल प्रणाली लागू करने का निर्णय लेकर स्पष्ट कर दिया है कि अब सीमा पर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और नशा तस्करों द्वारा ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थ भेजने की साजिशों को कुचलने के लिए यह कदम अत्यंत आवश्यक है।
उधर, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अवैध घुसपैठियों के खिलाफ और भी कठोर अभियान चलाया जाएगा। यह वही नीति है जिसकी मांग वर्षों से राष्ट्रवादी शक्तियां करती रही हैं। पश्चिम बंगाल में भी शुभेन्दु अधिकारी लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि घुसपैठियों को जल्द से जल्द अपने देश भाग जाना चाहिए।
देखा जाये तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को अब यह समझ लेना चाहिए कि भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल भारी पड़ सकती है। अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करना केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। जो लोग भारत की जमीन पर अवैध रूप से रहकर यहां की व्यवस्था पर बोझ बनते हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
भारत ने हमेशा मानवता और शरण की परंपरा निभाई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि देश की सीमाएं खुली छोड़ दी जाएं। आज आवश्यकता कठोर कार्रवाई, मजबूत सीमा सुरक्षा और घुसपैठियों के खिलाफ निर्णायक नीति की है। मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी जैसे नेताओं की आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह उस सच्चाई को सामने ला रहे हैं जिसे वर्षों तक वोट बैंक की राजनीति के कारण दबाया जाता रहा।
अब देश का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत की सीमा में अवैध प्रवेश करने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है। जो लोग घुसपैठ, तस्करी और षड्यंत्र के जरिए भारत की शांति को चुनौती देंगे, उन्हें कानून और सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई का सामना करना ही पड़ेगा।
