केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को FCRA 2.0 पोर्टल और e-OCI कार्ड लॉन्च किया। उन्होंने कहा कि नई डिजिटल सुविधाओं से 50 लाख से अधिक OCI (ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया) कार्डधारकों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी और विदेशी अंशदान (FCRA) से जुड़ी प्रक्रियाएं अधिक पारदर्शी और तेज होंगी। शाह ने कहा कि 2014 से पहले FCRA की व्यवस्था कागजी प्रक्रियाओं में उलझी हुई थी, अब तकनीक से इसे अधिक प्रभावी बनाया गया है। FCRA 2.0 पोर्टल से कागजी कार्यवाही कम होगी, आवेदनों के निपटारे में तेजी आएगी और विदेशी अंशदान की रियल टाइम निगरानी संभव होगी। दस्तावेज भौतिक रूप से जमा नहीं होंगे। इससे वैध संस्थाओं को सुविधा मिलेगी, जबकि गलत उद्देश्यों से आने वाले विदेशी फंड पर प्रभावी नजर रखी जा सकेगी। वहीं, e-OCI कार्ड के जरिए विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को सेवाएं आसान और डिजिटल रूप में उपलब्ध होंगी।
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गेमचेंजर क्यों माना जा रहा
एफसीआरए (FCRA) 2.0 को एक ‘गेमचेंजर’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 के लागू होने के बाद विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर एक बेहद स्पष्ट और कड़ा ढांचा तैयार करता है। इस नए बदलाव के तहत पहली बार उन धार्मिक गतिविधियों को साफ तौर पर परिभाषित किया गया है जिनके लिए विदेशी चंदा लिया जा सकता है, जैसे पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद, तीर्थयात्रियों की सुविधाएं, लंगर-धर्मशालाएं और आदिवासी परंपराओं का संरक्षण; लेकिन इसके साथ ही विदेशी फंड के जरिए धार्मिक परिवर्तन (धर्मांतरण) या प्रचार-प्रसार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इसके अलावा, पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ट्रस्टियों और डायरेक्टरों को “मुख्य पदाधिकारी” के दायरे में लाकर उनकी जवाबदेही तय की गई है, और अब विदेशी नागरिकों (भारतीय मूल के लोगों को छोड़कर) के मुख्य पदों पर रहने वाले एनजीओ को विशेष अनुमति के बिना पंजीकरण नहीं मिलेगा। साथ ही, वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए संगठनों को अगली किस्त पाने से पहले पिछले फंड का कम से कम 75 प्रतिशत हिस्सा खर्च करना अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे केंद्र सरकार के मुताबिक सिस्टम की कमियां दूर होंगी, वित्तीय जवाबदेही मजबूत होगी और पूरा ढांचा पूरी तरह तकनीक-आधारित हो जाएगा।
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विपक्ष की आपत्ति
विपक्षी पार्टियों ने FCRA के नए नियमों की आलोचना करते हुए कहा है कि इनसे सिविल सोसाइटी संगठनों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ेगा। विपक्ष के कई नेताओं ने इन बदलावों को वापस लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि “मुख्य पदाधिकारी” (key functionary) की व्यापक परिभाषा, पात्रता के कड़े नियम और अनुपालन (compliance) की सख्त शर्तें शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय क्षेत्रों में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), चैरिटी और स्वयंसेवी समूहों के कामकाज पर बुरा असर डाल सकती हैं। आलोचकों ने उस प्रावधान पर भी सवाल उठाए हैं जिसके तहत NGOs को अगली किश्त पाने से पहले मौजूदा विदेशी फंड का 75 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल करना होगा। उनका कहना है कि इससे लंबे समय तक चलने वाले विकास प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाले संगठनों के लिए कामकाज में दिक्कतें आ सकती हैं। उनका मानना है कि इन बदलावों से प्रशासनिक निगरानी बढ़ेगी और सिविल सोसाइटी संगठनों के लिए काम करने का दायरा सीमित हो सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि इन सुधारों का मकसद पारदर्शिता को बढ़ावा देना, विदेशी योगदान का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल सुनिश्चित करना और विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकना है, साथ ही डिजिटलाइज़ेशन के ज़रिए नियमों का पालन करना आसान बनाना है।
