सोमवार को शेयर बाजार में बीएसई के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार के दौरान बीएसई का शेयर करीब 5 प्रतिशत तक गिरकर 3,283 रुपये के निचले स्तर पर पहुंच गया। इस गिरावट की बड़ी वजह वैश्विक ब्रोकरेज कंपनी जेफरीज की रिपोर्ट रही, जिसमें बीएसई की रेटिंग को ‘होल्ड’ से घटाकर ‘अंडरपरफॉर्म’ कर दिया गया है। साथ ही शेयर का लक्ष्य मूल्य 3,520 रुपये से घटाकर 2,940 रुपये कर दिया गया है।
जेफरीज का नया लक्ष्य मूल्य मौजूदा स्तर से करीब 16 प्रतिशत नीचे है। ब्रोकरेज के मुताबिक बीएसई के कारोबार पर कई तरह के दबाव बन रहे हैं। इनमें घरेलू खुदरा कारोबारियों के अलावा अपने खाते से कारोबार करने वाले बड़े कारोबारी, प्रतिभूति लेनदेन कर में बढ़ोतरी, भारतीय रिजर्व बैंक के बैंक गारंटी से जुड़े कड़े नियम और समापन नीलामी सत्र प्रमुख हैं।
बता दें कि अपने खाते से कारोबार करने वाले घरेलू कारोबारी बीएसई के विकल्प कारोबार के कुल अनुमानित कारोबार में करीब आधी हिस्सेदारी रखते हैं। जेफरीज का मानना है कि समापन नीलामी सत्र से ऐसे कारोबारियों को नुकसान बढ़ रहा है, जिसका असर आगे चलकर बीएसई के कारोबार और आय पर पड़ सकता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, अगस्त 2026 में अब तक बीएसई के विकल्प कारोबार का औसत दैनिक कारोबार जुलाई की तुलना में 12 प्रतिशत कम रहा है। इसी अवधि में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के विकल्प कारोबार में भी करीब 14 प्रतिशत की गिरावट आई है। समापन नीलामी सत्र के दूसरे सप्ताह में बीएसई और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज दोनों के विकल्प कारोबार में पहले सप्ताह के मुकाबले करीब 20 से 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
जेफरीज के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक के बैंक गारंटी संबंधी नए नियमों का तत्काल बड़ा असर नहीं दिख सकता, लेकिन अगले एक साल में इससे विकल्प कारोबार के प्रीमियम आधारित कारोबार में करीब 10 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
ब्रोकरेज ने वित्त वर्ष 2027 से 2029 के बीच बीएसई की प्रति शेयर आय के अनुमान में 5 से 12 प्रतिशत तक कटौती की है। इसका कारण औसत दैनिक कारोबार की धीमी वृद्धि और बढ़ती समाशोधन लागत को बताया गया है। हालांकि जेफरीज को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 की दूसरी छमाही में कारोबार में सुधार हो सकता है, खासकर समापन नीलामी सत्र से जुड़ी दिक्कतें कम होने के बाद।
गौरतलब है कि बीएसई ने हाल के वर्षों में विकल्प कारोबार में अपनी बाजार हिस्सेदारी तेजी से बढ़ाई है। समाप्ति वाले दिनों में अब इसकी हिस्सेदारी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के करीब पहुंच गई है, लेकिन अन्य दिनों में बाजार हिस्सेदारी बढ़ने की रफ्तार धीमी हुई है। जेफरीज का अनुमान है कि यदि वित्त वर्ष 2028 और 2029 में बीएसई की बाजार हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2027 के स्तर पर ही रहती है, तो कंपनी की आय में 2 से 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त कमी आ सकती है।
बीएसई के पास आय बढ़ाने के लिए कुछ विकल्प भी मौजूद हैं। कंपनी विकल्प कारोबार पर शुल्क बढ़ा सकती है। फिलहाल बीएसई का शुल्क प्रति 10 लाख रुपये के प्रीमियम कारोबार पर 325 रुपये है, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का शुल्क 350 रुपये है। शुल्क बढ़ाने से बीएसई की प्रति शेयर आय में करीब 6 से 7 प्रतिशत तक सुधार हो सकता है। वहीं, सह-स्थित सुविधा के संदेश शुल्क में बढ़ोतरी से कर बाद लाभ में करीब 8 प्रतिशत का फायदा हो सकता है।
इस बीच, प्रबंधन स्तर पर भी बदलाव हुए हैं। बीएसई ने सौरभ शुक्ला को महत्वपूर्ण संचालन और गोपालन एस. राघवन को नियमन, अनुपालन, जोखिम प्रबंधन और निवेशक शिकायतों की जिम्मेदारी सौंपी है। वहीं, बाजार ढांचे से जुड़ी संस्थाओं के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की अधिकतम आयु सीमा बढ़ाने के भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के प्रस्ताव को लेकर भी चर्चा जारी है। बीएसई के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी जून 2027 में मौजूदा आयु सीमा के करीब पहुंचने वाले हैं।
हालांकि कंपनी के हालिया नतीजे मजबूत रहे हैं। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में बीएसई का एकीकृत शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 62 प्रतिशत बढ़कर 874 करोड़ रुपये रहा। परिचालन से आय भी 63 प्रतिशत बढ़कर 1,566 करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछले साल इसी अवधि में 958 करोड़ रुपये थी। निवेश से आय 79 करोड़ रुपये से बढ़कर 135 करोड़ रुपये हो गई है। ऐसे में आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि बीएसई बढ़ते नियामकीय दबाव और कारोबार की धीमी रफ्तार के बीच अपनी आय और बाजार हिस्सेदारी को किस तरह बनाए रखता है।