देश के शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार वाहनों से निकलने वाले धुएं पर नए नियम लागू करने की तैयारी कर रही है। भारत में बीएस-7 उत्सर्जन मानकों को अप्रैल 2029 से चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है। ये मानक यूरोप के यूरो-7 नियमों के अनुरूप होंगे। इनके तहत कारों, एसयूवी, माल ढोने वाले गाड़ियों और बसों से निकलने वाले हानिकारक प्रदूषकों पर ज्यादा सख्ती से नजर रखी जाएगी। सड़क परिवहन मंत्रालय ने इसके लिए प्रस्तावित समयसीमा को मंजूरी दे दी है और जल्द ही अलग-अलग वाहन श्रेणियों के लिए ड्राफ्ट नोटीफिकेशन जारी होने की उम्मीद है।
प्रस्तावित योजना के मुताबिक, बीएस-7 नियमों का पहला चरण अप्रैल 2029 से लागू होगा। इसमें अप्रैल 2029 से बनने वाली नई कारों और एसयूवी को शामिल किया जाएगा। इसके बाद 2030 से छोटे मालवाहक वाहनों और सामान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली पिकअप गाड़ियों पर ये नियम लागू होंगे। वहीं, बसों और भारी वाहनों के लिए अप्रैल 2031 की समयसीमा तय की गई है। दोपहिया वाहनों के लिए नए मानकों की घोषणा बाद में की जाएगी। बता दें कि देश में दोपहिया वाहनों की संख्या काफी ज्यादा है और प्रदूषण कम करने की योजना में इनकी भूमिका भी अहम मानी जाती है।
गौरतलब है कि भारत में अभी बीएस-6 उत्सर्जन मानक लागू हैं, जिन्हें अप्रैल 2020 से शुरू किया गया था। उस समय नए मानकों के अनुरूप पेट्रोल और डीजल तैयार करने के लिए तेल शोधन संयंत्रों में बड़े बदलाव करने पड़े थे। हालांकि, बीएस-7 के लिए ऐसे बदलावों की जरूरत नहीं होगी। अधिकारियों के मुताबिक, इस बार मुख्य रूप से वाहन कंपनियों को अपने इंजन और उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक में सुधार करना होगा।
नए नियमों के तहत नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और बेहद छोटे कणों जैसे प्रदूषकों पर सख्त निगरानी रखी जाएगी। कारों और एसयूवी के लिए ज्यादातर प्रदूषकों की तय सीमा बीएस-6 जैसी ही रहेगी, लेकिन बेहद छोटे कणों की जांच में बदलाव किया जाएगा। इनके आकार की सीमा 23 नैनोमीटर से घटाकर 10 नैनोमीटर करने का प्रस्ताव है। इससे ऐसे सूक्ष्म कणों को भी पकड़ना संभव होगा, जो फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
बीएस-7 की एक अहम बात यह है कि वाहनों की जांच केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहेगी। सड़क पर सामान्य परिस्थितियों में वाहन चलने के दौरान भी यह देखा जाएगा कि वे तय प्रदूषण सीमाओं का पालन कर रहे हैं या नहीं। इसके अलावा, वाहन के इस्तेमाल के पूरे समय में उत्सर्जन नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा। स्वतंत्र जांच एजेंसियां बाजार में चल रहे वाहनों की जांच कर सकेंगी। इसे बाजार निगरानी व्यवस्था के रूप में लागू करने की योजना है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, नए नियम केवल इंजन से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं होंगे। ब्रेक के घिसने और टायरों के सड़क पर रगड़ खाने से निकलने वाले कणों को भी नियमों के दायरे में लाया जाएगा। इससे प्रदूषण के उन स्रोतों पर भी ध्यान दिया जा सकेगा, जिन्हें अब तक उत्सर्जन नियंत्रण में उतनी प्रमुखता नहीं मिली थी।
भारी वाहनों और ट्रकों पर बीएस-7 का असर ज्यादा पड़ने की संभावना है। प्रस्तावित मानकों के तहत इन वाहनों से निकलने वाले अलग-अलग प्रदूषकों में करीब 20% से 50% तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। खास तौर पर सड़क पर वास्तविक इस्तेमाल के दौरान होने वाले उत्सर्जन पर सख्ती बढ़ेगी।
सरकार इस पूरी व्यवस्था को अप्रैल 2029 से अप्रैल 2035 के बीच 3 चरणों में लागू करने की तैयारी कर रही है। इससे वाहन निर्माताओं और जांच एजेंसियों को नई तकनीक अपनाने और जरूरी तैयारियां पूरी करने का समय मिलेगा। यूरोप में भी यूरो-7 मानक चरणबद्ध तरीके से लागू किए जा रहे हैं। वहां हल्के वाहनों के लिए नवंबर 2026 और भारी वाहनों के लिए मई 2028 से शुरुआत तय की गई है। भारत में बीएस-7 लागू होने से नए वाहनों की तकनीक में बदलाव आएगा और प्रदूषण नियंत्रण के लिए सड़क पर वास्तविक प्रदर्शन की निगरानी पहले से ज्यादा अहम हो जाएगी।
