नयी दिल्ली, छह नवंबर पशु अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने प्रयोगशाला में जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों के लिए केंद्र के प्रस्तावित नियमों में कुछ कमियों की ओर इशारा किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर संस्थागत समितियों को केंद्र की पूर्व जांच के बिना कुछ प्रयोगों को मंजूरी देने की छूट दी जाती है, तो इससे निगरानी व्यवस्था कमजोर हो सकती है और जानवर अनावश्यक पीड़ा झेलने के लिए मजबूर हो सकते हैं। वकीलों, पशु कल्याण कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिक तथा पशु चिकित्सा क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने इस सप्ताह यहां प्रेसवार्ता में एक अधिक सख्त नियामक ढांचा बनाने की मांग की।
उन्होंने तर्क दिया कि भारत को जानवरों पर परीक्षण की आवश्यकता की उचित जांच किए बिना, केवल उन्हीं पर निर्भर रहने के बजाय, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विकल्पों की ओर बढ़ना चाहिए। प्रस्तावित पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण) नियम, 2026 का उद्देश्य, प्रयोगों के लिए जानवरों के प्रजनन, व्यापार और उपयोग को नियंत्रित करने वाले मौजूदा 1968 और 1998 के नियमों को बदलना है। इस मसौदे में संस्थानों के पंजीकरण, प्रयोगों की मंजूरी, जानवरों की देखभाल और निगरानी तथा रिप्लेसमेंट, रिडक्शन और रिफाइनमेंट (थ्री आर) के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सिद्धांतों का पालन करने के प्रावधान शामिल हैं।
‘थ्री आर’ का उद्देश्य शोध और परीक्षणों में जानवरों के इस्तेमाल को कम करना और उन्हें अनावश्यक पीड़ा से बचाना है। कार्यकर्ताओं ने एक मुख्य चिंता प्रस्तावित अनुमोदन तंत्र को लेकर जताई है। इस तंत्र के तहत, हल्की और मध्यम श्रेणी के प्रयोगों को मंजूरी देने का अधिकार संस्थागत पशु नैतिक समितियों (आईएईसीएस) को दिया जाएगा और इसके लिए उन्हें केंद्रीय पशु प्रयोग नियंत्रण एवं निगरानी समिति (सीसीएसईए) के पास जाने की जरूरत नहीं होगी।
आलोहा अहिंसा फाउंडेशन के निदेशक और दिल्ली पशु कल्याण बोर्ड की कार्यकारी समिति के सदस्य डॉ. आशेर जेसुडॉस ने कहा कि ऐसी व्यवस्था से स्वतंत्र जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, खासकर तब, जब प्रयोग करने वाली संस्थाओं को ही यह तय करने में भी भूमिका दी जाए कि वे प्रयोग नैतिक रूप से स्वीकार्य हैं या नहीं। एक आधिकारिक बयान में उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से अधिक सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करने, बेहोश करने की दवा (एनेस्थीसिया) और दर्द निवारण के अनिवार्य प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने, छूट देने के मामलों पर कड़े प्रतिबंध लगाने, पशुओं पर किए जाने वाले प्रयोगों से संबंधित आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने तथा किसी भी प्रयोग को मंजूरी देने से पहले वैकल्पिक तरीकों पर विचार करना अनिवार्य बनाने की मांग की। पशुओं पर किए जाने वाले प्रयोगों के वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद होने पर सवाल उठाते हुए जेसुडॉस ने कहा कि मनुष्यों पर चिकित्सकीय परीक्षणों के चरण में पहुंचने वाली लगभग 90 प्रतिशत दवाओं को मंजूरी नहीं मिल पाती, जबकि इससे पहले वे गैर-नैदानिक परीक्षणों से गुजर चुकी होती हैं, जिनमें अक्सर पशुओं पर प्रयोग भी शामिल होते हैं।
वर्ष 2024 की एक समीक्षा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अध्ययन में शामिल पशुओं पर परीक्षण किए गए उपचारों में से केवल पांच प्रतिशत को ही नियामक मंजूरी मिली। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस निष्कर्ष को पशुओं पर किए जाने वाले सभी प्रयोगों की समग्र विफलता दर नहीं माना जाना चाहिए। जेसुडॉस ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि किसी पदार्थ को पशु मॉडल में सुरक्षित पाया गया है, यह जरूरी नहीं कि वह मनुष्यों के लिए भी सुरक्षित होगा।
भारत को मानव शरीर के अनुरूप शोध के वैकल्पिक तरीकों में बड़े पैमाने पर निवेश करने की जरूरत है। इनमें ऑर्गन-ऑन-चिप तकनीक, ऑर्गेनॉइड (प्रयोगशाला में विकसित सूक्ष्म अंग जैसी संरचनाएं), मानव कोशिकाओं पर आधारित शोध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटर मॉडलिंग शामिल हैं।”
