नयी दिल्ली, एक अक्टूबर भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने बृहस्पतिवार को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) न्यायिक शोध एवं अदालती प्रक्रियाओं में सहायता कर सकती है, लेकिन वह विधिक विवेक या निर्णय लेने की उस भूमिका की जगह कभी नहीं ले सकती, जो हमेशा न्यायाधीशों के पास ही रहनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने उज्बेकिस्तान के समरकंद में एशियाई संवैधानिक न्यायालयों एवं समकक्ष संस्थानों के संघ की सातवीं कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन को संबोधित करते हुए कहा कि न्याय तक पहुंच बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इससे कमजोर वर्ग के नागरिक वंचित न हों और न्यायिक व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर न पड़े। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जून 2026 में उच्चतम न्यायालय की एआई समिति ने अदालतों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल से संबंधित मसौदा नियम जारी किए।’’
उन्होंने कहा कि इनमें स्पष्ट किया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक शोध और अदालत की प्रक्रियाओं में सहायक हो सकती है, लेकिन वह न्यायिक सूझ-बूझ या निर्णय लेने की भूमिका की जगह कभी नहीं ले सकती तथा यह भूमिका हमेशा न्यायाधीश के पास ही रहनी चाहिए।
उज्बेकिस्तान की आधिकारिक यात्रा पर गए प्रधान न्यायाधीश ने एक अन्य कार्यक्रम में ‘न्याय का डिजिटलीकरण : भारत के उच्चतम न्यायालय की दिशा’ विषय पर भी संबोधन दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्याय के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को स्वतंत्रता, समानता और न्याय तक पहुंच की संवैधानिक गारंटी के अनुरूप ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
