मणिपुर की पहाड़ियों में जारी हिंसा अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर देश की सीमा सुरक्षा और संप्रभुता तक पहुंचता दिख रहा है। हम आपको बता दें कि तंगखुल अजे कतमनाओ लॉन्ग यानी सदर्न तंगखुल स्टूडेंट्स यूनियन ने केंद्र और मणिपुर सरकार को कड़ी चेतावनी दी है कि अगर भारत-म्यांमार सीमा से सटे नागा इलाकों के लोगों को सुरक्षा नहीं मिली, तो वे मजबूरी में पड़ोसी देशों से, यहां तक कि चीन से भी मदद मांगने पर विचार कर सकते हैं। संगठन के अध्यक्ष यारचूइसो काशुंग का कहना है कि लगातार हिंसा और असुरक्षा से लोग अब बुरी तरह थक चुके हैं।
बताया जा रहा है कि यह महज राजनीतिक नाराजगी वाला बयान नहीं है। इसके पीछे हाल में हुई कई हत्याओं और हमलों का संदर्भ है। काशुंग ने तामेंगलोंग में 17 वर्षीय लियांगमेई नागा युवक, सेनापति में तीन माओ नागा नागरिकों और कामजोंग के पिलोंग में चार तंगखुल नागा नागरिकों की हत्या का हवाला देते हुए जवाबदेही की मांग की है। उनका आरोप है कि सीमावर्ती गांव लगातार असुरक्षित हैं और सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है। काशुंग ने यह भी कहा कि यदि मुख्यमंत्री राज्य और उसके लोगों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं तो उन्हें स्वेच्छा से इस्तीफा दे देना चाहिए। इससे साफ है कि असंतोष अब केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य सरकार की राजनीतिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
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मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि यह इलाका भारत-म्यांमार अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा है। मई में भी कामजोंग के नामली, वांगली और चोरो जैसे तंगखुल गांवों पर सीमापार से हमलों के आरोप लगे थे। उस दौरान घरों में आग लगने और ग्रामीणों के जंगलों की ओर भागने की खबरें सामने आई थीं। कुछ रिपोर्टों में म्यांमार स्थित सशस्त्र कुकी गुटों पर आरोप लगाए गए, हालांकि ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में नहीं हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मणिपुर में नागा-कुकी-जो तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार मई 2023 से शुरू हुई व्यापक जातीय हिंसा में अब तक 306 लोगों की मौत हुई है और 28 हजार से अधिक लोग अभी भी विस्थापित हैं। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र ने मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को भी एक अक्टूबर से अगले छह महीने के लिए बढ़ाया है। यानी एक तरफ सुरक्षा कानून का विस्तार हो रहा है, दूसरी तरफ सीमा पर रहने वाला एक नागा संगठन यह कह रहा है कि उसे सुरक्षा का भरोसा ही नहीं मिल रहा। यही विरोधाभास इस पूरे संकट को और गंभीर बनाता है।
यहां सवाल यह भी उठता है कि जब सीमा पर रहने वाला कोई समुदाय यह कहने लगे कि उसे अपने ही देश में सुरक्षा नहीं मिल रही और वह चीन जैसे पड़ोसी से मदद लेने की बात कर रहा है, तो इसे केवल एक बयान मानकर खारिज करना जोखिम भरा हो सकता है। चीन का नाम इस पूरे मामले को स्थानीय जातीय संघर्ष से उठाकर राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति के सवाल तक पहुंचा देता है। अब गेंद केंद्र और मणिपुर सरकार के पाले में है। अब सिर्फ शांति की अपील से काम नहीं चलेगा, बल्कि सीमावर्ती नागरिकों की सुरक्षा, जवाबदेही और भरोसा बहाल करने की ठोस कार्रवाई ही इस असंतोष को रोक सकती है।
इसके अलावा, मणिपुर जैसे संवेदनशील और लंबे समय से हिंसा झेल रहे क्षेत्र में ऐसे बयानों को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया मानकर छोड़ देना भी ठीक नहीं होगा। सरकार और आम लोगों को यह भी देखना होगा कि कहीं तनाव, असुरक्षा और कथित असंतोष का इस्तेमाल बाहरी प्रभाव बढ़ाने के लिए तो नहीं किया जा रहा। हम आपको बता दें कि इस प्रकार के आरोप लगते रहे हैं कि विदेशी चंदे से संचालित होने वाले संगठन भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे रहते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2020 से 2023 के बीच मणिपुर की 43 संस्थाओं के विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम के पंजीकरण रद्द किए गए थे।
इसीलिए चीन से मदद लेने की चेतावनी जैसे बयान के मामले में जांच जरूरी है। यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह केवल स्थानीय समुदाय की वास्तविक सुरक्षा चिंता और सरकार पर दबाव बनाने का तरीका है? या फिर क्या कोई बाहरी संगठन, वित्तीय नेटवर्क या प्रतिबंधित उग्रवादी ढांचा इस असंतोष को अपने रणनीतिक हित के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है? मणिपुर में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों के खिलाफ जांच एजेंसियां पहले से ही अलगाववादी गतिविधियों, अवैध धन जुटाने और भारत की संप्रभुता के खिलाफ हिंसक अभियान जैसे आरोपों की जांच करती रही हैं। बहरहाल, मणिपुर में चीन का नाम लेकर दिया गया ताजा बयान सरकार के लिए सतर्क रहने का संकेत भी माना जाना चाहिए।
-नीरज कुमार दुबे
