लेह-लद्दाख! नाम सुनते ही आंखों के सामने बर्फ से ढकी गगनचुंबी चोटियां, पैंगोंग झील का नीला जादुई पानी और सर्पीली सड़कों पर बाइक दौड़ाते सैलानियों का मज़ा तैरने लगता है। इसके साथ ही ज़हन में आते हैं दुनिया की सबसे ऊंची जंग का मैदान सियाचिन, भारत-चीन युद्ध की ऐतिहासिक शौर्य गाथाएं और लद्दाख की आवाज़ बने सोनम वांगचुक। लेकिन ज़रा रुकिए… बर्फ की चादर में लिपटा, बेहद शांत और शांत दिखता यह लद्दाख हमेशा ऐसा नहीं था! अगर इन विशाल काली चट्टानों को ज़ुबान मिल जाए, तो ये आपको खूनी युद्धों, बौद्ध भिक्षुओं की शांति, और दुनिया के सबसे खतरनाक व्यापारिक रास्तों से गुज़रते कारवां की ऐसी कहानियां सुनाएंगी कि आपके रोंगटे खड़े हो जाएं। यह सिर्फ पहाड़ों का देश नहीं है, बल्कि सदियों पुराने रहस्यों का एक ऐसा कुआं है जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। आइए, आज आपको लद्दाख के उसी अनदेखे, अनसुने और हैरान कर देने वाले इतिहास की एक रोमांचक सैर पर ले चलते हैं!
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लद्दाख कब और कैसे बना भारत का हिस्सा
लद्दाख का शुरुआती इतिहास काफी हद तक धुंधला और लोकथाओं में लिपटा हुआ है। शुरुआती दौर में यहां मोन और दाद जातियों के लोग रहा करते थे। जो मुख्य रूप से घुमंतू और चरवाहे थे। लेकिन इस इलाके की किस्मत तब पलटी जब एक प्राचीन सिल्क रूट का यह एक अहम हिस्सा बन गया। भारत, चीन, सेंट्रल एशिया और तिब्बत के बीच व्यापार करने वाले व्यापारी इसी रास्ते से गुजरते थे। धीरे-धीरे यहां बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। कश्मीर और तिब्बत से आने वाले भिक्षुओं ने यहां बौद्ध धर्म की जड़े मजबूत की। आठवीं और नौवीं शताब्दी के दौरान लद्दाख तिब्बती साम्राज्य का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया था। जिसके कारण यहां की संस्कृति, भाषा और परंपराएं आज भी तिब्बत से बहुत ही ज्यादा मिलती जुलती हैं। लद्दाख के इतिहास का सबसे रोमांचक अध्याय शुरू होता है 15वीं शताब्दी के आखिर में जब नामगयाल राजवंश की नीव पड़ी। कहलूर रियासत के एक साधारण से गाँव में जन्मे और ज़मीन के पारिवारिक विवाद के कारण अपना घर छोड़ने वाले जोरावर सिंह कहलुरिया ने हरिद्वार के मैदानों से लेकर जम्मू के दुर्गम क्षेत्रों तक न सिर्फ युद्ध की कलाएँ सीखीं, बल्कि महाराजा रणजीत सिंह, राजा संसार चंद और डोगरा राजा गुलाब सिंह जैसे महान शासकों के भरोसे को जीतकर अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। भीमगढ़ किले की कमान से लेकर किश्तवाड़ की गवर्नरशिप तक का सफर तय करने वाले इस वीर की तलवार ने साल 1834 में जब लद्दाख के बर्फीले रास्तों का रुख किया, तो उसने तिब्बत से अफगानिस्तान तक फैले व्यापारिक मार्गों की तकदीर और डोगरा साम्राज्य की सीमाओं का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। लद्दाख आधिकारिक तौर पर हमेशा के लिए जम्मू की डोगरा रियासत का हिस्सा बन गया और फिर जम्मू कश्मीर के साथ ही सन 47 में लद्दाख भारत का हिस्सा बना।
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5 अगस्त 2019 लद्दाख में एक नया सवेरा लेकर आया
साल 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो कश्मीर को लेकर गतिरोध चलने लगा। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी बनने के बाद लद्दाख भी भारत का अभिन्न अंग बन गया। लेकिन चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद से इस इलाके पर चीनी दावे शुरू हो गए। चीन पूरे लिए लद्दाख पर अपना दावा जताता रहा है। 1962 में हुई भारत चीन की लड़ाई के बाद से चीन ने लद्दाख के अक्साई चीन का इलाका अपने कब्जे में कर लिया। हालांकि भारत उस इलाके को हमेशा से अपना अभिन्न अंग मानता आया है। लेह लद्दाख की बात करें तो शुरू में इसे जम्मू कश्मीर राज्य के भीतर एक जिले के रूप में रखा गया। लेकिन अपनी अलग भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पहचान और सामरिक महत्व के कारण यहां के लोगों की लंबे समय से यह मांग थी कि इसे एक अलग पहचान दी जाए। आखिरकार 5 अगस्त 2019 का दिन लद्दाख के इतिहास में एक नया सवेरा लेकर आया। जब भारतीय संसद ने इसे एक अलग केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया। आज लद्दाख अपनी प्राचीन मोनेस्ट्रीज, पगोंग, झील और लेह की वादियों के साथ-साथ भारतीय सेना के शौर्य का भी एक बहुत ही बड़ा प्रतीक है। संक्षेप में कहें तो लेह लद्दाख का इतिहास सिर्फ बर्फ और चट्टानों की कहानी नहीं है बल्कि यह इंसानी जीजीवी, व्यापार, सांस्कृतिक मेलजोल और संघर्ष की एक ऐसी गाथा है जो हर किसी को हैरान कर देती है।
गलवान से पैंगोंग तक चीन की दखल
1962 के युद्ध में चीन ने जबरन अक्साई चीन के लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा जमा लिया। तब से लेकर आज तक गलवान घाटी से लेकर पैंगोंग के तटों तक चीन सीमा विवाद को भड़काकर लद्दाख पर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। हालांकि, भारतीय सेना के कड़े जवाब और अडिग संकल्प ने यह साफ कर दिया है कि अक्साई चीन समेत पूरा लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है। प्रशासनिक दृष्टि से शुरू में इसे जम्मू-कश्मीर का एक जिला बनाया गया था। चीन के इस अनवरत क्षेत्रीय दावे के बावजूद, भारतीय सेना ने हर दौर में अपनी सरहदों की हिफाजत के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है और भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि अक्साई चीन समेत पूरा लद्दाख देश का अटूट और अभिन्न अंग है।
