भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। हमारे पर्व और उत्सव केवल सामाजिक उल्लास के अवसर नहीं रहे बल्कि प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व के प्रतीक भी रहे हैं। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण, प्रदूषण और जल संकट जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारत में 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाने वाला ‘वन महोत्सव’ केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं है बल्कि पृथ्वी पर जीवन बचाने का राष्ट्रीय संकल्प बन चुका है। वास्तव में यदि वर्तमान समय की आवश्यकताओं को देखा जाए तो वन महोत्सव से बड़ा कोई उत्सव नहीं हो सकता क्योंकि इसका संबंध केवल पर्यावरण से नहीं बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य से है। भारतीय परंपरा में वनों को देवतुल्य माना गया है। वे केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि पृथ्वी के फेफड़े, जैव विविधता के सबसे बड़े आश्रय, नदियों के संरक्षक, जलवायु संतुलन के प्रहरी तथा करोड़ों लोगों की आजीविका के आधार हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से ठीक पहले जुलाई 1947 में दिल्ली में चलाए गए व्यापक वृक्षारोपण अभियान ने वन महोत्सव की अवधारणा को जन्म दिया था, जिसे वर्ष 1950 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। जुलाई के प्रथम सप्ताह का चयन इसलिए किया गया क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी होने से पौधों के जीवित रहने की संभावना सर्वाधिक रहती है। आज यह अभियान भारत के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के दर्शन का जीवंत प्रतीक बन चुका है।
वनों की स्थिति विश्व स्तर पर चिंताजनक बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी का केवल लगभग 31 प्रतिशत भूभाग ही वनाच्छादित है जबकि प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र अवैध कटाई, औद्योगिकीकरण, खनन और अवसंरचनात्मक विकास की भेंट चढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आगामी दशकों में विश्व के अनेक वर्षावन गंभीर संकट में पड़ सकते हैं। ऐसे समय में भारत जैसे विशाल और जैव विविधता से समृद्ध देश की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। भारत ने हाल के वर्षों में वन संरक्षण और वृक्षारोपण की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण की भारत वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण बढ़कर 8,27,357 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है। इसमें 7,15,343 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र तथा 1,12,014 वर्ग किलोमीटर वृक्ष आवरण शामिल है। पिछले आकलन की तुलना में कुल हरित आवरण में 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज हुई। क्षेत्रफल के आधार पर मध्य प्रदेश सबसे अधिक वन क्षेत्र वाला राज्य है जबकि अरुणाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ उसके बाद आते हैं। वहीं वन घनत्व के अनुपात में मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय अग्रणी हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेज असेसमेंट रिपोर्ट में भारत को कुल वन क्षेत्र के आधार पर विश्व में नौवां स्थान तथा वार्षिक वन क्षेत्र वृद्धि के मामले में अग्रणी देशों में स्थान प्राप्त हुआ है।
हालांकि इन उपलब्धियों के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हरित आवरण में हुई वृद्धि का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक सघन वनों के बजाय खुले वनों तथा व्यावसायिक वृक्षारोपण के कारण हुआ है। प्राकृतिक वन केवल पेड़ों का समूह नहीं होते बल्कि हजारों वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, सूक्ष्मजीवों और जल स्रोतों का जटिल पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं। इनका स्थान कृत्रिम पौधारोपण कभी नहीं ले सकता। विशेष चिंता का विषय पूर्वोत्तर भारत है, जहां सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं, झूम खेती, भूस्खलन तथा अन्य विकास गतिविधियों के कारण कई क्षेत्रों में वन क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह स्पष्ट किया है कि वनों के क्षरण का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता बल्कि इसका सीधा असर वन्यजीवों और मानव जीवन पर पड़ता है। प्राकृतिक आवास नष्ट होने से हाथी, बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीव भोजन एवं पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने लगे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के बाद प्रतिपूरक वृक्षारोपण तो किया जाता है लेकिन पौधों की देखभाल, सिंचाई और संरक्षण की अनदेखी के कारण उनमें से अधिकांश जीवित नहीं रह पाते। केवल पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखना ही वास्तविक सफलता है।
आज वन मानव स्वास्थ्य के सबसे बड़े संरक्षक बन चुके हैं। वायु प्रदूषण, जल संकट और भूमि के मरुस्थलीकरण जैसी समस्याओं का सबसे प्रभावी और किफायती समाधान वृक्ष ही हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करते हैं, ऑक्सीजन उपलब्ध कराते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं, भूजल स्तर बनाए रखते हैं तथा मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। बढ़ते प्रदूषण के कारण कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों में तेजी से वृद्धि हो रही है। साथ ही, अनियमित मानसून, भीषण हीटवेव, सूखा, क्लाउडबर्स्ट और जंगलों में आग जैसी घटनाएं स्पष्ट संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। इस संकट से निपटने के लिए भारत ने वर्ष 2030 तक अतिरिक्त 2.5 से 3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन सिंक विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसमें वनों की भूमिका निर्णायक होगी।
बहरहाल, वन महोत्सव का वास्तविक संदेश केवल एक सप्ताह भर लाखों पौधे लगाने तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी सफलता इस बात में निहित है कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप नीम, पीपल, बरगद, बेल, जामुन, अर्जुन और अन्य देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए तथा प्रत्येक पौधे की कम से कम तीन वर्षों तक नियमित देखभाल सुनिश्चित की जाए। जब तक वृक्षारोपण को जनभागीदारी और जन-जिम्मेदारी का अभियान नहीं बनाया जाएगा, तब तक हरित भारत का सपना अधूरा रहेगा। विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आर्थिक प्रगति, आधुनिक तकनीक और अवसंरचनात्मक विकास आवश्यक हैं किंतु वे स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और संतुलित जलवायु का विकल्प नहीं बन सकते। यदि वन सुरक्षित रहेंगे तो नदियां जीवित रहेंगी, भूजल समृद्ध होगा, जैव विविधता संरक्षित रहेगी और मानव सभ्यता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इसलिए वन महोत्सव केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व और राष्ट्रीय आंदोलन बनना चाहिए। आज आवश्यकता केवल वृक्ष लगाने की नहीं बल्कि उन्हें बचाने की है क्योंकि आने वाली पीढ़ियां हमसे विकास की ऊंची इमारतें नहीं बल्कि सांस लेने योग्य स्वच्छ पृथ्वी की विरासत चाहेंगी।
– योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण विषयों के जानकार तथा पर्यावरण संरक्षण पर बहुचर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के लेखक हैं)