उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के बाद जारी अंतिम आंकड़ों ने राज्य की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव सामने रखा है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची के अनुसार लगभग दो करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह संख्या अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है और राज्य की कुल जनसंख्या तथा चुनावी भागीदारी पर गहरा प्रभाव डालने वाली है।
हम आपको याद दिला दें कि उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान कुल 166 दिनों तक चला, जिसकी शुरुआत 27 अक्टूबर 2025 को हुई थी। उस समय राज्य में कुल 15 करोड़ 44 लाख मतदाता पंजीकृत थे। प्रारंभिक चरण के बाद छह जनवरी को प्रकाशित प्रारूप सूची में यह संख्या घटकर बारह करोड़ पचपन लाख रह गई थी। हालांकि इसके बाद आपत्तियों, दावों, सुनवाई और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया के पश्चात अंतिम सूची में कुल 13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792 वैध मतदाता दर्ज किए गए।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं का नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाया है, वे पंद्रह दिनों के भीतर संबंधित जिला अधिकारी के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके बाद भी समाधान न मिलने पर दूसरी अपील मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास की जा सकती है और अंत में नया मतदाता बनने के लिए प्रपत्र छह भरा जा सकता है।
यदि जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी लखनऊ में सबसे अधिक नौ लाख चौदह हजार नाम हटाए गए, जो लगभग 22.79 प्रतिशत है। इसके बाद प्रयागराज में आठ लाख छब्बीस हजार, कानपुर में छह लाख सत्तासी हजार, आगरा में छह लाख सैंतीस हजार, गाजियाबाद में पांच लाख चौहत्तर हजार, मेरठ में पांच लाख छह हजार और बरेली में चार लाख छप्पन हजार नाम हटाए गए। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद में तीन लाख सोलह हजार नाम हटाए जाने के साथ यह सूची में सबसे ऊपर रहा, जबकि नोएडा, लखनऊ उत्तर, आगरा कैंट और इलाहाबाद उत्तर भी प्रमुख रहे।
छह जनवरी से दस अप्रैल के बीच कुल आठ लाख पंद्रह हजार नौ सौ छियानवे मतदाताओं के नाम हटाए गए। इनमें से तीन लाख पचास हजार से अधिक लोगों ने नोटिस का जवाब नहीं दिया, लगभग तीन लाख अट्ठाईस हजार लोग स्थानांतरित पाए गए, उनहत्तर हजार से अधिक नाम बहु प्रविष्टि के कारण हटाए गए, पचपन हजार से अधिक मतदाता मृत पाए गए और दो हजार से अधिक लोग आयु या नागरिकता मानकों पर खरे नहीं उतरे।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तीन करोड़ छब्बीस लाख से अधिक नोटिस जारी किए गए। लगभग एक करोड़ चार लाख मतदाता ऐसे पाए गए जिनकी जानकारी पूरी तरह से मेल नहीं खा रही थी, जबकि दो करोड़ 22 लाख मामलों में तार्किक विसंगतियां थीं। चौदह जनवरी से नोटिस जारी होने शुरू हुए और 31 जनवरी से सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होकर 27 मार्च तक पूरी की गई।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जोर देकर कहा कि किसी भी मतदाता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटाया गया। यदि किसी का नाम प्रारूप सूची में था लेकिन अंतिम सूची में नहीं है तो यह या तो प्रपत्र में त्रुटि के कारण हुआ है या फिर सुनवाई के बाद लिया गया निर्णय है।
हम आपको बता दें कि अंतिम सूची के अनुसार राज्य में सात करोड़ तीस लाख इकहत्तर हजार इकसठ पुरुष मतदाता, छह करोड़ नौ लाख नौ हजार पांच सौ पच्चीस महिला मतदाता और चार हजार दो सौ छह तृतीय लिंग मतदाता हैं। अठारह से उन्नीस वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या सत्रह लाख तिरसठ हजार तीन सौ साठ है।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रारूप और अंतिम सूची के बीच कुल चौरासी लाख अट्ठाईस हजार सात सौ सड़सठ मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। इसमें बयालीस लाख से अधिक पुरुष और लगभग इतने ही महिला मतदाता शामिल हैं। इससे लिंग अनुपात में भी सुधार हुआ है, जो आठ सौ चौबीस से बढ़कर आठ सौ चौंतीस हो गया है।
जिलों में मतदाता वृद्धि के मामले में प्रयागराज सबसे आगे रहा, जहां तीन लाख उनतीस हजार से अधिक नए मतदाता जुड़े। इसके बाद लखनऊ, बरेली, गाजियाबाद और जौनपुर प्रमुख रहे। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद, जौनपुर, लखनऊ पश्चिम, लोनी और फिरोजाबाद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
हम आपको यह भी बता दें कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश मतदाता विलोपन प्रतिशत के मामले में दूसरे स्थान पर रहा, जहां यह आंकड़ा तेरह दशमलव चौबीस प्रतिशत रहा। इससे आगे गुजरात रहा, जबकि अन्य राज्यों में यह प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। तीसरे पक्ष द्वारा दिए गए आवेदनों के आधार पर एक लाख बीस हजार से अधिक नाम हटाए गए। इनमें अधिकतर मामले मृत्यु, स्थायी स्थान परिवर्तन या अन्यत्र पंजीकरण से जुड़े थे।
इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भी सक्रिय भागीदारी रही। पांच प्रमुख बैठकों के अलावा नौ सौ चार बैठकों का आयोजन जिला स्तर पर किया गया। पांच लाख से अधिक बूथ स्तरीय एजेंटों ने इस प्रक्रिया में भाग लिया। इसके अतिरिक्त हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों के सहयोग से यह विशाल अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा बल्कि इससे चुनावी पारदर्शिता और सटीकता को भी नई दिशा मिली है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। नई सूची में खासकर शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जिससे सत्तारुढ़ दल भाजपा की चिंता बढ़ सकती है। लखनऊ, मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों में अक्तूबर 2025 की तुलना में लगभग 19 से 23 प्रतिशत तक मतदाता घटे हैं। ये वही क्षेत्र हैं जहां पिछले चुनावों में भाजपा का मजबूत प्रभाव रहा है। विधानसभा स्तर पर भी साहिबाबाद, नोएडा, लखनऊ उत्तर और आगरा कैंट जैसी सीटों पर बड़ी संख्या में मतदाता कम हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार जिन सीटों पर एक लाख से अधिक वोट घटे हैं, उनमें अधिकांश पर भाजपा का कब्जा है। इसके विपरीत, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, जहां लगभग 9 से 14 प्रतिशत तक ही कमी दर्ज की गई।