तमिलनाडु के सलेम क्षेत्र में एक दिलचस्प राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। लगभग दो दशक पहले जिस नाम से जंगलों में भय का माहौल बन जाता था, उसी वीरप्पन की विरासत को अब उसकी बेटी और पत्नी नए रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हैं। कभी एक खतरनाक जंगली डाकू के रूप में पहचाने जाने वाले वीरप्पन की छवि को अब लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से एक अलग दिशा देने का प्रयास हो रहा है।
हम आपको बता दें कि वीरप्पन की बड़ी बेटी विद्यारानी, जो पेशे से वकील हैं, वह इस बार मेट्टूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। वह नाम तमिलर काची नामक पार्टी की उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमा रही हैं। यह उनका दूसरा चुनाव है, इससे पहले उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में कृष्णगिरि से चुनाव लड़ा था और एक लाख से अधिक मत हासिल किए थे। दूसरी ओर, उनकी मां मुथुलक्ष्मी कृष्णगिरि सीट से तमिलगा वलवुरिमै काची पार्टी की उम्मीदवार हैं। हम आपको बता दें कि यह दोनों ही दल तमिल पहचान और तमिल राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक आधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
विद्यारानी का कहना है कि यदि उनके पिता आज जीवित होते तो वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते। वह अपने भाषणों में वीरप्पन की छवि को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसने शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। मेट्टूर में एक जनसभा के दौरान उन्होंने कहा कि उनके पिता को जिस तरह से खतरनाक अपराधी के रूप में दिखाया गया, वह पूरी सच्चाई नहीं है। उनके इस बयान को खासकर युवाओं के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है।
नाम तमिलर काची के प्रमुख सीमैन भी विद्यारानी के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने वीरप्पन की तुलना एक ऐसे रक्षक से की जो जंगलों और तमिल समाज की रक्षा करता था। इस तरह के बयान यह संकेत देते हैं कि यह चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पहचान और इतिहास की व्याख्या भी शामिल है।
हम आपको बता दें कि विद्यारानी की राजनीतिक यात्रा भी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत पट्टाली मक्कल काची से की थी, जो वन्नियार समुदाय में मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टी मानी जाती है। बाद में वह 2020 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं और फिर 2024 में नाम तमिलर काची का दामन थाम लिया। इस बदलाव से यह भी स्पष्ट होता है कि वह अपने लिए एक ऐसी राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं जहां उनकी पहचान और विचारधारा को ज्यादा जगह मिल सके।
दूसरी ओर, वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी अपने चुनाव प्रचार में किसानों के मुद्दों पर खास जोर दे रही हैं। उनका कहना है कि उन्होंने किसानों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को करीब से समझा है। वह पानी, फसल और किसानों की गरिमा के सवाल को अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बना रही हैं। उनका यह रुख ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही महिलाएं अपने अतीत को छिपाने के बजाय उसे खुले तौर पर स्वीकार कर रही हैं। उनका कहना है कि उन्हें लोगों से किसी तरह का विरोध नहीं झेलना पड़ रहा, बल्कि उन्हें सम्मान मिल रहा है। यह बात इस ओर इशारा करती है कि समय के साथ लोगों की सोच में भी बदलाव आया है और अब वह पुराने घटनाक्रमों को नए नजरिए से देखने लगे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों की उम्मीदवारी का असर खास तौर पर पट्टाली मक्कल काची पर पड़ सकता है, जो अन्नाद्रमुक की सहयोगी पार्टी है। मेट्टूर और कृष्णगिरि क्षेत्र में वन्नियार समुदाय का प्रभाव काफी ज्यादा है और यह माना जा रहा है कि विद्यारानी और मुथुलक्ष्मी इस समुदाय के मतों में सेंध लगा सकती हैं। हालांकि दोनों उम्मीदवार अपने अभियान में जाति को सीधे तौर पर मुद्दा नहीं बना रही हैं, फिर भी सामाजिक समीकरणों पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है।
बहरहाल, यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि छवि, विरासत और पहचान की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश भी है। वीरप्पन की कहानी को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करने का यह प्रयास तमिलनाडु की राजनीति में एक अनोखा अध्याय जोड़ रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस नई कथा को कितना स्वीकार करते हैं और इसका चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ता है?
-नीरज कुमार दुबे