पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अक्सर खेला होबे का नारा लगाकर विरोधियों पर निशाना साधती हैं लेकिन लगता है कि इस बार उनकी पार्टी के साथ ही खेला होने जा रहा है। हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और इस बार खेल के मैदान में एक नया मोर्चा उतर चुका है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी का गठजोड़ सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के उस मजबूत वोट बैंक को चुनौती देता नजर आ रहा है, जिस पर अब तक ममता बनर्जी का अटूट नियंत्रण माना जाता रहा है। देखा जाये तो यह गठबंधन केवल चुनावी तालमेल नहीं बल्कि सत्ता के समीकरणों को हिला देने वाली आक्रामक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
ओवैसी का यह ऐलान ऐसे समय आया है जब तृणमूल कांग्रेस पहले ही दबाव में है। मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में संदिग्ध नामों को हटाए जाने की कार्रवाई ने पार्टी के उस आधार को झटका दिया है, जिसे लेकर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठाता रहा है। ऐसे में ओवैसी और कबीर का गठजोड़ सीधे उसी जमीन पर दस्तक दे रहा है, जहां तृणमूल की पकड़ कमजोर होती दिख रही है।
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हम आपको याद दिला दें कि कभी ममता बनर्जी के करीबी रहे हुमायूं कबीर का तृणमूल कांग्रेस से अलग होना कोई साधारण घटना नहीं थी। मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों में उनकी मजबूत पकड़ है और अब वह उसी ताकत को ओवैसी के साथ मिलाकर एक नए राजनीतिक ध्रुव में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद बनाने जैसे मुद्दों को उठाकर उन्होंने पहले ही अपनी पहचान एक आक्रामक नेता के रूप में स्थापित कर ली है। अब जब वह 149 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर चुके हैं, तो यह साफ संकेत है कि उनका इरादा केवल मौजूदगी दर्ज कराना नहीं बल्कि सीधी टक्कर देना है।
देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ने वाला है। वर्ष 2011 से लेकर अब तक मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा तृणमूल के साथ मजबूती से खड़ा रहा है। यही समर्थन ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत भी रहा है। लेकिन अब यही वोट बैंक बंटने की कगार पर है। ओवैसी और कबीर दोनों ही खुद को मुस्लिम समुदाय की आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं और तृणमूल पर उपेक्षा के आरोप लगा रहे हैं। यह रणनीति अगर जमीन पर असर दिखाती है तो तृणमूल के लिए यह सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने इस गठजोड़ पर तीखा हमला बोला है और ओवैसी को भाजपा का सहयोगी तक करार दे दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि ओवैसी का मकसद केवल वोटों का बंटवारा करना है, जिससे भाजपा को फायदा पहुंचे। यह आरोप नया नहीं है, लेकिन हर चुनाव में यह बहस और तेज हो जाती है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में यह गठजोड़ भाजपा के लिए रास्ता आसान करेगा या फिर तृणमूल के खिलाफ एक नया विकल्प बनकर उभरेगा?
हम आपको यह भी बता दें कि वाम दल और अन्य गठबंधनों की स्थिति भी इस बार दिलचस्प है। सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बनने के कारण एकजुट विपक्ष की तस्वीर अभी अधूरी है। ऐसे में ओवैसी और कबीर का मोर्चा उस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रहा है, जहां असंतुष्ट मतदाता विकल्प तलाश रहे हैं। कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला भी इस बिखराव को और गहरा करता है।
हालांकि ओवैसी की पार्टी के सामने भाषा और क्षेत्रीय पहचान की चुनौती भी कम नहीं है। पश्चिम बंगाल के अधिकांश मुस्लिम मतदाता बांग्ला भाषी हैं, जबकि ओवैसी की पहचान उर्दू भाषी राजनीति से जुड़ी रही है। लेकिन अगर स्थानीय चेहरों के सहारे यह कमी पूरी कर ली जाती है, तो समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल का आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक पहचान की जंग बनने जा रहा है। ओवैसी और कबीर का गठजोड़ इस जंग में एक नए मोर्चे के रूप में उभरा है, जिसने तृणमूल कांग्रेस की नींद उड़ा दी है। अगर मुस्लिम वोटों में दरार गहरी होती है, तो यह चुनाव परिणामों को पूरी तरह पलट सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि क्या यह नया समीकरण केवल शोर बनकर रह जाएगा या सच में सत्ता के समीकरण बदल देगा। लेकिन इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।
