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- UPSC Aspirants Akanksha Singh Same Roll Number | Rank 301 Controversy
4 मिनट पहले
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बिहार के आरा की आकांक्षा बांए और यूपी के गाजीपुर की आकांक्षा दांए
UPSC सिविल सर्विस एग्जाम रिजल्ट 2025 में एक ही रैंक पर दो कैंडिडेट्स ने दावा कर दिया है। UPSC द्वारा जारी मेरिट लिस्ट में AIR 301 पर आकांक्षा सिंह हैं, जिनका रोल नंबर 0856794 है। इस सिलेक्शन पर बिहार और यूपी से 2 अलग-अलग छात्राओं ने दावा किया है। इन दोनों कैंडिडेट्स का नाम आकांक्षा सिंह है।
बिहार की आकांक्षा के एडमिट कार्ड में है गड़बड़ी
दैनिक भास्कर ने मामले की पड़ताल के लिए दोनों कैंडिडेट्स के एडमिट कार्ड चेक किए। यूपी के गाजीपुर की आकांक्षा के इंटरव्यू कॉल लेटर पर दर्ज रोल नंबर 0856794 है। इस एडमिट कार्ड पर दिख रहे QR को स्कैन करने पर भी यही रोल नंबर दिख रहा है।
वहीं बिहार के आरा की आकांक्षा सिंह ने भास्कर को अपना प्रीलिम्स एडमिट कार्ड उपलब्ध कराया। हालांकि, इस पर भी रोल नंबर 0856794 ही लिखा दिख रहा है। मगर QR स्कैन करने पर रोल नंबर 085659 दिख रहा है।
ऐसे में या तो UPSC की ओर से एडमिट कार्ड जारी करने में कोई गड़बड़ी हुई है, या फिर बिहार की आकांक्षा के एडमिट कार्ड से छेड़छाड़ की गई है। इस मामले पर अभी UPSC की ओर से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।

बिहार की आकांक्षा का एडमिट कार्ड बांए, यूपी की आकांक्षा का एडमिट कार्ड दांए
यूपी की आकांक्षा ने कहा- अब कोई कंफ्यूजन नहीं

यूपी की आकांक्षा ने पटना AIIMS से MBBS, MS की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद UPSC की तैयारी में जुट गईं। ये उनका दूसरा अटेम्प्ट था।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रंजीत सिंह की बेटी आकांक्षा ने दैनिक भास्कर को बताया कि उसने 0856794 रोल नंबर से अगस्त 2025 में मेंस और 4 फरवरी 2026 को इंटरव्यू दिया था।
उन्होंने कहा- मुझे क्लियर है कि यह रिजल्ट मेरा है, आप मेरे एडमिट कार्ड पर दर्ज कोड या रोल नंबर से जांच कर सकते हैं। UPSC की साइट पर कोई डाउट नहीं है। मीडिया में मिस इनफॉरमेशन हुआ है। पूरा मामला क्लियर हो चुका है कि ये रिजल्ट मेरा है। आरा की रहने वाली आकांक्षा को लगता है कि रिजल्ट उसका है तो सामने आकर इस बात का खंडन करें और प्रूफ के साथ दिखाएं। मुझे नहीं पता कि आरा की आकांक्षा ने किस आधार पर रिजल्ट देखा है।
मैंने इसी रोल नंबर से मेंस समेत तीनों टेस्ट दिए हैं। मेरे पिता हर बार मुझे एग्जाम दिलवाते हैं। जब मैंने फॉर्म भरा था तब मुझे यह रोल नंबर मिला था।
बिहार की आकांक्षा ने कहा- ये मेरी नहीं UPSC की गलती

बिहार की आकांक्षा सिंह रणवीर सेना वाले ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की पोती हैं।
बिहार की आकांक्षा भोजपुर जिले के अगिआंव प्रखंड के खोपीरा गांव की रहने वाली हैं। हालांकि, उनका परिवार आरा शहर के कतीरा मोहल्ले में रहता है। आकांक्षा की प्रारंभिक शिक्षा आरा के कैथोलिक मिशन स्कूल से हुई। उन्होंने साल 2017 में मैट्रिक की परीक्षा दी और 80 प्रतिशत नंबर्स लाए।
साल 2019 में इंटरमीडिएट (विज्ञान) की परीक्षा में 81 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए साल 2022 में इंग्लिश से ग्रेजुएशन किया, जिसमें 64 प्रतिशत मार्क्स के साथ वो फर्स्ट आईं।
दैनिक भास्कर से बातचीत में आकांक्षा ने बताया- मेरा जीवन बेहद सादगीपूर्ण रहा है और मैंने सीमित संसाधनों के बीच रहकर कड़ी मेहनत और लगन से ये मुकाम हासिल किया है। मेरे पिता कुमार इंदू भूषण सिंह किसान हैं और मां रिंकू देवी हाउस वाइफ हैं।
बिहार की आकांक्षा रणवीर सेना वाले ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती हैं
आकांक्षा सिंह बिहार की रणवीर सेना वाले ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की पोती हैं। भोजपुर जिले के खोपीरा गांव में रामबालक सिंह के घर 13 मार्च 1947 को जन्में ब्रह्मेश्वर सिंह बिहार में जातिगत लड़ाई का चर्चित चेहरा थे। साल 1960 में पंचायती राज आया तो र्निविरोध मुखिया चुन लिए गए, 30 साल तक खोपीरा के मुखिया रहे। टाइटिल मुखिया का मिला, पहचान ब्रह्मेश्वर मुखिया बन गई। नक्सली संगठनों और बड़े किसानों के बीच खूनी संघर्षों में हथियार उठाया और बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।

1994 में बनाई थी रणवीर सेना
साल 1994 में रणवीर सेना का गठन किया, यह ऊंची जाति के जमींदारों की प्राइवेट आर्मी कही जाती थी। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने कम समय में बिहार में बड़ा जनाधार तैयार कर लिया। इस बीच मुखिया और उनकी सेना पर दर्जनों बार नरसंहार का आरोप लगा। वह 9 साल के लिए जेल भी गए, लेकिन पहले बेल मिली, फिर बरी हो गए।
1995 में बिहार सरकार ने रणवीर सेना पर बैन लगाया
बिहार सरकार ने जुलाई 1995 में रणवीर सेना पर प्रतिबंध लगा दिया। 2005 में नीतीश कुमार की सरकार आने के बाद बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधरने लगी। नक्सल आंदोलन कमजोर पड़ने लगा। इस बारे में सीनियर जर्नलिस्ट प्रियदर्शी रंजन बताते हैं, ‘2005 के बाद रणवीर सेना का कोई इतिहास आपको नहीं मिलेगा।’
‘सेना का मकसद पूरा होने लगा, तो उसकी प्रासंगिकता भी खत्म होने लगी। 1 जून 2012 को आरा में ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या ने एक बार फिर पूरे बिहार को हिला दिया।’

2012 में मॉर्निंग वॉक के दौरान हुई थी हत्या
जनाधार और राजनीतिक द्वेष में 1 जून 2012 को आरा के कतिरा मोड़ पर मार्निंग वॉक के दौरान 70 साल की उम्र में ब्रह्मेश्वर मुखिया को गोलियों से छलनी कर दिया था।
इस घटना में आरा से लेकर पटना तक आक्रोश की आग में जलने लगा। घटना ऐसी कि बिहार पुलिस को एक साल में कोई सुराग नहीं मिला और सीबीआई को तह तक पहुंचने में 10 साल लग गए।
तब के DGP अभयानंद बताते हैं, ‘ब्रह्मेश्वर मुखिया की शवयात्रा में हालात संभालने के दौरान किसी नेता का मेरे पास फोन नहीं आया था। मुखिया की हत्या के साथ ही रणवीर सेना खत्म हो गई। उसका पूरा संगठन बिखर गया।’
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