पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम, असम और पुडुचेरी में संपन्न विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए मिला जुला चित्र प्रस्तुत किया है। कुछ राज्यों में पार्टी को निराशा हाथ लगी, जबकि कुछ क्षेत्रों में उसे उल्लेखनीय सफलता भी मिली। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पक्ष मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन रहा, जिसने कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दी है। खास तौर पर असम और केरलम में कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों ने प्रभावशाली जीत दर्ज कर यह संकेत दिया है कि इन इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा अभी भी इस गठबंधन के साथ बना हुआ है।
केरलम में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा ने दस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सत्ता में वापसी की। राज्य में चुने गए 35 मुस्लिम विधायकों में से 30 संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा से संबंधित हैं। इनमें कांग्रेस के आठ और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के 22 विधायक शामिल हैं। यह परिणाम बताता है कि राज्य में मुस्लिम मतदाताओं ने संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा पर व्यापक भरोसा जताया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की उम्मीदवार फातिमा तहलिया की जीत विशेष रूप से चर्चा में रही। उन्होंने कोझिकोड जिले की पेराम्ब्रा सीट पर माकपा नेता टीपी रामकृष्णन को पांच हजार से अधिक मतों से हराया। इस जीत के साथ वह पार्टी की पहली मुस्लिम महिला विधायक बन गईं। उनकी सफलता को मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
असम में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन और भी अधिक प्रभावशाली रहा। पार्टी ने राज्य में 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 18 ने जीत दर्ज की। इसके विपरीत कांग्रेस के अधिकांश गैर मुस्लिम उम्मीदवार हार गए और केवल एक गैर मुस्लिम प्रत्याशी को सफलता मिली। कांग्रेस ने कुल 101 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मुस्लिम उम्मीदवारों की सफलता दर अत्यंत ऊंची रही। कांग्रेस के सहयोगी रायजोर दल को भी दो सीटों पर जीत मिली, जिनमें एक मुस्लिम उम्मीदवार की थी, जबकि दूसरी सीट अखिल गोगोई ने जीती। अखिल गोगोई पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा माओवादी गतिविधियों से जुड़े आरोपों की जांच चल रही है।
असम में कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों ने भारी अंतर से जीत दर्ज की। गौरिपुर सीट पर कांग्रेस के अब्दुल सोबहान अली सरकार ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार निजानुर रहमान को 19097 मतों से हराया। जलेश्वर सीट पर कांग्रेस के आफताब मोल्ला ने एआईयूडीएफ नेता शेख आलम को 109688 मतों के भारी अंतर से पराजित किया। समागुरी में तंजिल हुसैन ने भाजपा के अनिल सैकिया को 108310 मतों से हराया। इसके अलावा अलगापुर कटलीछड़ा जैसी सीटों पर भी कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत का अंतर एक लाख से अधिक रहा। इन परिणामों ने यह संकेत दिया कि असम के कई क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के पक्ष में मजबूती से एकजुट हुए।
हालांकि असम में कांग्रेस की इस सफलता के बावजूद एआईयूडीएफ प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने एआईयूडीएफ को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन अब स्वयं समाप्त हो गई है। अजमल ने यह भी कहा कि कांग्रेस अब मुस्लिम लीग बन गई है और यह स्थिति उन्हें दुखी करती है। उनका यह बयान असम की राजनीति में मुस्लिम मतों को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है। हम आपको यह भी याद दिला दें कि चुनाव प्रचार के दौरान असम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “माओवादी मुस्लिम लीग कांग्रेस” करार दिया था। आखिरकार उनकी बात सही साबित हुई।
वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली, लेकिन दोनों सीटें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से थीं। पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस की तुलना में अधिक मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से एक को जीत मिली। इन परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस ने कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय को साधने की रणनीति अपनाई थी और कुछ स्थानों पर उसे इसका लाभ भी मिला।
मत प्रतिशत के आंकड़े भी इन चुनावों की राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करते हैं। असम में भाजपा को 37.81 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस को 29.84 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। दूसरी ओर केरलम में कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को मिलाकर कुल 39.80 प्रतिशत मत मिले। इससे यह स्पष्ट होता है कि केरलम में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
बहरहाल, इन विधानसभा चुनावों ने यह संकेत दिया है कि देश की राजनीति में धार्मिक और सामाजिक आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है। एक ओर जहां भाजपा को व्यापक रूप से हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय का झुकाव फिर से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। खासकर असम और केरलम में मुस्लिम उम्मीदवारों की उल्लेखनीय सफलता ने कांग्रेस को नई राजनीतिक ऊर्जा दी है। वहीं भाजपा और अन्य दलों द्वारा कांग्रेस पर तुष्टीकरण तथा वोटबैंक की राजनीति के आरोपों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले समय में यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तीखी हो सकती है, क्योंकि विभिन्न दल अपने अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
-नीरज कुमार दुबे