नयी दिल्ली, छह नवंबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा के दायरे में आता है, क्योंकि इसपर सरकार का ‘‘गहरा और व्यापक’’ नियंत्रण है। संविधान का अनुच्छेद 12 मौलिक अधिकारों के संदर्भ में ‘राज्य’ शब्द को परिभाषित करता है। इसके तहत, ‘राज्य’ की परिभाषा में आने वाली किसी संस्था के खिलाफ अपने मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए कोई व्यक्ति अदालत, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के अध्यक्ष और एक अन्य व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। इस अपील में दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के 2012 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि यह न्यास ‘राज्य’ का एक अभिकरण है। पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, हम मानते हैं कि उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने किसी एक कारक के बजाय न्यास पर सरकार के नियंत्रण के समग्र प्रभाव पर जोर देकर सही किया था।’’
फैसले को लिखने वाले न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, ‘‘सरकार की भूमिका न्यास की स्थापना से ही शुरू होती है।
इसके संचालन मंडल की संरचना और प्रमुख पदाधिकारी की नियुक्ति से लेकर इसके कार्यकारी एवं वित्तीय प्रशासन तक में सरकार की भूमिका रहती है। इसके अलावा, लेखा परीक्षा, और न्यास के संचालन ढांचे के विभिन्न पहलुओं पर सरकारी मंजूरी के जरिए भी सरकार का नियंत्रण बना रहता है। यह केवल सीमित या सामान्य नियामक निगरानी नहीं है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 12 के दायरे से बाहर रखा जा सके।’’
फैसले में कहा गया कि एनबीटी इस कसौटी पर खरा उतरता है कि उस पर सरकार का ‘‘वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से प्रभुत्व है या उसका नियंत्रण है।’’
इसमें कहा गया, ‘‘इसलिए, हम उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के इस निष्कर्ष को बरकरार रखते हैं कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में ‘अन्य प्राधिकरण’ है और इस उद्देश्य के लिए उसे ‘राज्य’ माना जायेगा।’’
फैसले में कहा गया कि न्यास में सरकार की भूमिका सामान्य नियामक निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार उसकी स्थापना, संचालन मंडल की संरचना, कार्यकारी कामकाज, वित्तीय प्रशासन, लेखा परीक्षा और संचालन ढांचे में बदलावों को मंजूरी देने तक है।
इसमें कहा गया है कि एनबीटी की स्थापना अच्छी साहित्यिक पुस्तकों को बढ़ावा देने और उन्हें आम जनता को उचित कीमतों पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भारत सरकार के 15 जून, 1957 और 28 सितंबर, 1962 के प्रस्तावों के जरिए की गई थी। फैसले में कहा गया कि इसके संचालन संबंधी नियमों के तहत अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। इसमें कहा गया कि सरकार के प्रतिनिधि कार्यकारी समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसके पास प्रशासनिक, प्रबंधकीय और निर्णय लेने संबंधी अधिकार हैं।
इसमें कहा गया कि वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधि न्यास के वित्तीय सलाहकार के रूप में भी कार्य करता है। वित्तीय निगरानी के दायरे को रेखांकित करते हुए फैसले में कहा गया कि न्यास को अपनी वार्षिक रिपोर्ट और लेखा-परीक्षित खातों को सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है। फैसले में अजय हासिया मामले समेत पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि सरकार किसी संस्था पर वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से व्यापक नियंत्रण रखती है, तो उसे ‘राज्य’ माना जा सकता है।
